सपा-कांग्रेस गठबंधन नफा या नुकसान ?

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akhilesh
रायबरेली : सपा का कांग्रेस के साथ गठबंधन जिले में समाजवादी पार्टी के लिये घाटे का सौदा बन सकता है। यदि सपा सियासी समझदारी से काम नहीं लेती है तो जमीनी स्तर पर मजबूत इस पार्टी में कांग्रेस की संेधमारी तय है। यही नहीं इससे पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल टूट सकता है। जो भविष्य की राजनीति के लिये भी हितकारी नहीं होगा।

सपा और कांग्रेस के आला नेताओं ने वर्तमान विधान सभा चुनाव में गठबंधन पर मुहर लगा दी है। सीटों के बंटवारे का फार्मूला भी निकाल लिया गया है, सिर्फ औपचारिक घोषणा बाकी है। जानकारो की मानें तो कांगे्रस से सपा के गढ़ में प्रत्याशी नहीं उतरेंगे। साथ ही वह चाहती है कि समाजवादी पार्टी भी रायबरेली और अमेठी में अपने प्रत्याशी न उतारे। उनका मानना है कि सपा भी सैद्धांतिक रूप से इस फार्मूले पर राजी हो चुकी है सिर्फ वह थोड़ा बहुत परिवर्तन की बात कर रही है। देर रात तक इस पर अंतिम मुहर लगना तय माना जा रहा है। इस चुनावी गठबंधन पर जिले में पार्टी कार्यकर्ताओं से लेकर मतदाताओं तक में चर्चाओं का बाजार गर्म हो चुका है। जबकि दोनो दलो के संभावित प्रत्याशी आत्म विश्लेषण एवं मंथन में जुट गये है। सभी को अपनी प्रत्याशिता जाने का भय सता रहा है। सभी अपनी राजनैतिक पकड़, उपलब्धियों, तथ्यों को तर्कों की कसौटी पर कस रहे हैं। इन सबके बीच एक बात स्पष्ट दिखाई दे रही है कि कांग्रेस खेमे में उत्साह तथा सपाई खेमे में मायूसी का वातावरण है। अब अगर तथ्यों की बात की जाये तो वर्तमान में रायबरेली एवं अमेठी की कुल दस विधान सभा सीटों में से सात विधान सभा सीटें समाजवादी पार्टी के पास, दो कांग्रेस के पास तथा एक निर्दलीय प्रत्याशी के खाते में है। इससे स्पष्ट है कि इस क्षेत्र में समाजवादी पार्टी का जनाधार कांग्रेस की तुलना में अधिक मजबूत है। यहीं नहीं इसी क्षेत्र से सपा सरकार में दो कबीना मंत्री भी थे। दो विधायकों को विधान सभा की समितियों का अध्यक्ष बना कर लाल बत्ती की सौगात दी गई थी। इस लिहाज से इन्हे पार्टी की वरीयता सूची में माना जा सकता है।

यदि कांग्रेस के दावे को मानते हुये इस क्षेत्र की सभी सीटें कांग्रेस की झोली में डाली गयी तो इन विशिष्ट लोगो का क्या होगा। लेकिन सपाई दावेदार इसे मानने को तैयार नहीं है। उनका मानना है कि पार्टी ऐसी राजनैतिक गलती नहीं कर सकती। इस क्षेत्र की सीटों को लेकर भी कुछ मोलभाव अवश्य हुआ होगा। क्योंकि एक साथ सभी सींटे गठबंधन की किसी पार्टी को दे देने का खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ सकता है। उनकी इस बात में दम भी है क्योंकि कमजोर राजनैतिक जमीन की कांग्रेस इस कदम के बाद सपा के मजबूत वोट बैंक में सेंध मारी कर सकती है, जो भविष्य में भी समाजवादी पार्टी के लिये नुकसानदेह भी होगी।

रिपोर्ट – राजेश यादव

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