सपा कांग्रेस समझौते को लेकर जिले मेें कयासो का दौर

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रायबरेली : समाजवादी पार्टी की अंतर्कलह के चलते जिले में उसकी सियासी जमीन खिसकी थी। वहीं कांग्रेस के साथ उसके समझौते के चलते उसे कुछ आक्सीजन मिलने की सम्भावना बलवती हो गयी है। वैसे इस समझौते से सपा को जिले में एक अलग तरह की बगावत का सामना करना पड़ सकता है। जिले में पार्टी के अंदर एवं बाहर हो रही चर्चाओं में यह बात तो साफ तौर पर उभरकर सामने आ रही है।

समाजवादी पार्टी में राष्ट्रीय अध्यक्ष पद और चुनाव निशान सायकिल चुनाव आयोग के निर्णय के बाद प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को मिल गये हैं। परिणाम स्वरूप अखिलेश यादव ही सपा का असली चेहरा बन चुके हैं। अखिलेश यादव की इस मजबूती के साथ संगठन स्तर पर उनकी पकड़ काफी मजबूत हुई है। कल तक जो वरिष्ठ नेता मुलायम अथवा अखिलेश के चयन को लेकर पशोपेश में थे उनमें से अधिकांश आज अखिलेश के साथ खड़े नजर आ रहे हैं। अब जिले में संगठन विरोधी खेमे की संख्या सिमिट कर ना के बराबर रह गई है। लेकिन कांग्रेस से समझौते के लगभग पूर्ण हो जाने के समाचार के बाद जिले में एक अलग तरह के बगावत के संकेत मिलने लगे हैं। यहां के राजनैतिक विश्लेशको का मानना है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली एवं उपाध्यक्ष राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र अमेठी में अधिकांश सीटे समझौते के तहत कांग्रेस की झोली में आयेंगी। वैसे यदि वर्तमान हालात पर गौर करे तो रायबरेली की पाॅच सीटों में से चार सपा तथा एक निर्दलीय खाते में है। जबकि अमेठी की पाॅच विधान सभा सीटों में से दो कांग्रेस एवं तीन सपा के खाते में हैं। यानि वर्तमान में संसदीय क्षेत्रों में दस में से सात विधान सभा सीटों में सपा का ही कब्जा है। अब जब समझौते के तहत इन सीटों का बंटवारा होगा तो स्थिति इसके विपरीत भी हो सकती है। यदि कांग्रेसी नेताओ की भविष्यवाणियों पर भरोसा करें तो रायबरेली एवं अमेठी की विधान सभा सीटें कांग्रेस के खाते में ही जा रही है। लेकिन सपा खेमा इसे कुछ फेरबदल के साथ बुझे मन से स्वीकार कर रहा है। सपा नेताओं का कयास यह है कि सम्भवतः अमेठी संसदीय क्षेत्र से एक तथा रायबरेल संसदीय क्षेत्र से अपनी दो जीती हुई सीटे कांगे्रस की झोली में डाल सकती है। इन सीटो पर भी अटकले लगाई जा रही है। अब हालात यह हैं कि इन कयासो के दायरे में आने वाले क्षेत्र के वर्तमान विधायक तो पूरी तरह चुप्पी साधे हैं लेकिन उनके समर्थक इस अन्याय का जी जान से विरोध करने की बात खुलेआम कहने लगे हैं। यदि यह कयासबाजी सच साबित हुई तो यहा सपा का नुकसान लगभग तय है।

रिपोर्ट – राजेश यादव

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