कांक्रीट के जंगलों में गुम हुई गौरैया

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चन्दौली : गौरैया दिवस पर विशेष…घर के आँगन की शोभा बढ़ाने वाली गौरैया को कौन नहीं जानता है | कुछ समय पहले शायद ही कोई घर ऐसा होगा जहाँ इनकी उपस्थिति नहीं होती थी |सुबह हो या शाम हर वक्त आँगन व् छत पर इनकी ची ची कि आवाज गूंजती थी लेकिन कुछ समय से यह प्रजाति लुप्तप्राय हो चली है |कारण साफ़ है ,बढ़ता प्रदुषण ,वाइब्रेशन व् ग्लोबल वार्मिंग इस पक्षी पर भारी पड़ा है | गौरैया एक छोटी सी चिड़िया है इसमें नर् के गले में काला रिंग व् बदन सफ़ेद और मादा के सफ़ेद भूरा रंग लिए होती है |सुबह हुई नहीं कि इनकी आवाज कानो तक पहुचने लगती थी और अँधेरा होने तक गुजती रहती थी |खास बात ये है कि इनका बसेरा भी घरो में ही होता था |छाजन ,छप्पर या फिर मड़ाई में अपना घोसला बना कर रहने वाले ये पक्षी घर के जूठे भोजन व् कीड़े मकोडो से अपना पेट पाल लिया करते थे |एक दशक पूर्व घर का आँगन इन चिड़ियों से पटा रहता था मगर अब गाँव गिराव को छोड़ दे तो शहरी क्षेत्रों में इनका अस्तित्व समाप्त हो चुका है |

जानकारों की माने तो बरसात के दिनों में जब ये चिड़िया धुल में अपने आपको लिप्त कर अठखेलिय करती थी तो माना जाता था कि बारिश अच्छी होगी |इतना ही नहीं आंधी तूफ़ान इस पक्षी को सबसे पहले ही हो जाता था |घरेलु परिवेश में रहने वाले इन पक्षियों को बढ़ते प्रदुषण,वायुमंडल में संचार क्रान्ति के वाइब्रेशन व् ग्लोबल वार्मिंग के कारण समाप्ति के कगार पर लाकर खड़ा कर6 दिया है | चील, बाज, गिद्ध और गरुड़ ही नहीं, गौरैया भी अब भारत में लुप्त होने के कगार पर पहुँच गई है। जलवायु परिवर्तन नहीं, मोबाइल फोन का चस्का इस चिड़िया की चहचहाहट के चुप हो जाने का प्रमुख कारण बन गया है।एक समय था, जब भोर होते ही गौरैयों की चहक के साथ शहरों और गाँवों में दिन की चहल-पहल शुरू होती थी। अब वह शुरू होती है मोबाइल फोन प्रेमियों की बातचीत के साथ। देखा जाय तो रेलवे स्टेशनों, अनाज के गोदामों और रिहायशी बस्तियों में गौरैयाँ अब लगभग नहीं मिलतीं।वैसे तो पूरी दुनिया में गौरैयों की संख्या तेजी से घट रही है मगर विशेषज्ञों की माने तो इसके कई कारण है | कारों के लिए सीसारहित (अनलेडेड) पेट्रोल से पैदा होने वाले मीथाइल नाइट्रेट जैसे यौगिक, जो उन कीड़ों-मकोड़ों के लिए बहुत जहरीले होते हैं, जिन्हें गौरैयाँ चुगती हैं। खेतों और बगीचों में ऐसे कीटनाशकों का बढ़ता हुआ उपयोग, जो गौरैयों के बच्चों लायक कीड़ों-मकोड़ों को मार डालते हैं। घास के खुले मैदानों का लुप्त होते जाना, आजकल के भवनों और मकानों की पक्षियों के लिए अहितकारी बनावट और जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान का बढ़ना भी। इमारतों की छतों पर मोबाइल फोन कंपनियों के बढ़ते हुए एंटेना और ट्रांसमीटर टॉवर गौरैया चिड़ियों की घटती हुई संख्या का आजकल मुख्य कारण बनते जा रहे हैं। उनका कहना है कि ये टॉवर रात दिन 900 से 1800 मेगाहर्ट्ज फ्रीक्वेंसी का विद्युतचुंबकीय विकिरण (इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन) पैदा करते हैं, जो चिड़ियों के शरीर के आर पार चला जाता है। उनके तंत्रिकातंत्र और उनकी दिशाज्ञान प्रणाली को प्रभावित करता है। उन्हें अपने घोंसले और चारे की जगह ढूँढने में दिशाभ्रम होने लगता है और अपने घोसले में वापस नही जा पाने के कारण भी इनकी वंश वृद्धि रुक जाती है।

रिपोर्ट–उमेश दुबे

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