संकटा पर्व पर विशेष: जाने व्रत से जुड़ी हर बात

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उन्नाव ब्यूरो- हमारे क्षेत्र की महिलाएं यह व्रत संतान की कुशलता की कामना व लंबी आयु हेतु भगवान गणेश और माता पार्वती की पूजा अर्चना करती हैं। इस व्रत में क्षेत्र की महिलाएं अपने अपने बच्चों की दीर्घायु के लिए कामना करती है वैसे तो हर क्षेत्र में व्रत को अलग अलग तरके से मनाया जाता है लेकिन उन्नाव क्षेत्र के बांगरमऊ, सफीपुर, हसनगंज, पुरवा, बीघापुर आदि जगहों पर में यह ब्रत के लिए जो तैयारी की जाती हैं, जिसमे गुड़ से तैयार किये व्यंजनो का विशेष महत्व होता है, जिसमे तिल के लड्डू, चने के लड्डू,लैया के लड्डू, तिल्ली के लड्डू, आटे के पीड़ा तथा गन्ने आदि का उपयोग, जिसको लेकर सफीपुर नगर की नानाराव पेशवा मार्ग ब्लाक रोड, गुलाब बिल्डिंग रोड, बांगरमऊ की मेन रोड, चौधरी मार्किट आदि जगहों पर लगी दुकानों पर अच्छी खासी भीड़ देखने को मिली वैसे तो आजकल की महिलाओं के पास समय के अभाग के चलते मार्किट में गुड़ से तैयार किये हुए व्यंजन मिलते हैं ।

यह व्रत माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी का व्रत लोक प्रचलित भाषा में इसे संकटा चौथ कहा जाता है इस दिन संकट हरण गणेशजी का पूजन किया जाता है, यह व्रत संकटों तथा दुखों को दूर करने वाला तथा सभी इच्छाएं व मनोकामनाएं पूरी करने वाला है| इस दिन स्त्रियां निर्जल व्रत करती हैं गणेशजी की पूजा की जाती है और कथा सुनने के बाद चंद्रमा को अर्ध्य देकर ही व्रत खोला जाता है| इस संकट चौथ व्रत की कथा कुछ इस प्रकार है कि किसी नगर में एक कुम्भार रहता था। एक बार उसने बर्तन बनाकर आंवा लगाया तो आंवा पका ही नहीं । हारकर वह राजा के पास जाकर प्रार्थना करने लगा।

राजा ने राजपंडित को बुलाकर कारण पूछा तो राल्पन्दित ने कहा की हर बार आंवा लगते समय बच्चे की बलि देने से आंवा पक जाएगा। राजा का आदेश हो गया, बलि आरम्भ हुई, जिस परिवार की बारी होती वह परिवार अपने बच्चो में से एक बच्चा बलि के लिए भेज देता। इसी तरह कुछ दिनों बाद सकट के दिन एक बुडिया के लड़के की बारी आयी। बुडिया के लिए वाही जीवन का सहारा था। राजा आज्ञा कुछ नहीं देखती। दुखी बुडिया सोच रही थी की मेरा तो एक ही बीटा है ,वह भी सकट के दिन मुझसे जुदा हो जाएगा|

बुडिया ने लड़के को सकट की सुपारी और दूब का बीड़ा देकर कहा “भगवान का नाम लेकर आंवा में बैठ जाना । सकट माता रक्षा करेंगी। ” बालक आंवा में बिठा दिया गया और बुडिया सकत माता के सामने बैठकर पूजा करने लगी । पहले तो आंवा पकने में कई दिन लग जाते थे,पर इस बार सकत माता की कृपा से एक ही रात में आंवा पाक गया था । सवेरे कुम्भार ने देखा तो हैरान रह गया । आंवा पाक गया था । बुडिया का बेटा एवं अन्य बालक भी जीवित एंव सुरक्षित थे । नगर वासियों ने सकत की महिमा स्वीकार की तथा लड़के को भी धन्य माना ।संकटा माता की कृपा से नगर के अन्य बालक भी जी उठे ।

प्राचीन युग से ही हमारे देश में नारी का विशेष स्थान रहा है । देव शक्तियाँ वहीं पर निवास करती हैं जहाँ पर समस्त नारी जाति को प्रतिष्ठा व सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है ।हमारे पौराणिक ग्रंथों में नारी को पूज्यनीय एवं देवीतुल्य माना गया है । यह प्रकृति की प्रमुख सहचरी भी है जो जड़ स्वरूप पुरुष को अपनी चेतना प्रकृति से आकृष्ट कर शिव और शक्ति का मिलन कराती है। साथ ही संसार की सार्थकता सिद्ध करती है।इन प्राचीन ग्रंथों का उक्त कथन आज भी उतनी ही महत्ता रखता है जितनी कि इसकी महत्ता प्राचीन काल में थी ।

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