स्तंभेश्वर महादेव – भगवान् भोले नाथ का एक ऐसा मंदिर जो दिन में दो बार आँखों के सामने से हो जाता हैं ओझल

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stambheshwar mahadev
भारत वर्ष में भगवान् शिव अर्थात शंकर भगवान् का अपना अलग ही महत्त्व है बड़े से बड़े राजा महराजा, संत हर किसी के लिए भगवान् भोले नाथ सबसे अधिक महत्त्व रखते है I हिन्दू धर्म में ऐसी मान्यता हैं कि सबसे पहले भोले भंडारी को ही प्रशन्न किया जा सकता है I सबसे अधिक साधारण विधि-विधान से इनकी ही पूजा भी होती हैं I

 

आपको बता दें कि पूरे भारत वर्ष में भोले नाथ के अनेकों मंदिर है या फिर यूँ कहें तो हर हिन्दू के ह्रदय में बसते है भोले नाथ लेकिन कुछ ऐसे भी मंदिर हैं भारत में जिनका अलग ही महत्त्व हैं और यह मंदिर कुछ विशेष कारणों से भी प्रसिद्द हैं पूरे संसार में I भगवान् भोले नाथ, शिव शंकर का एक ऐसा ही मंदिर हैं गुजरात के वडोदरा से 85 किमी दूर स्थित जंबूसर तहसील के कावी-कंबोई गांव में जो अपनी एक अलग विशेषता के लिए ही प्रसिद्द हैं I

 

इस पवित्र तीर्थ का नाम है स्तंभेश्वर महादेव I आपको ज्ञात होना चाहिए कि भोलेनाथ का यह मंदिर प्रतिदिन सुबह शाम में एक-एक बार हमारी आँखों के सामने से ओझल हो जाता हैं I और कुछ देर के बाद फिर से एक बार भोले नाथ अपने भक्तों के सामने प्रकट हो जाते हैं I ऐसा इसलिए होता हैं क्योंकि यह भोले नाथ शिवलिंग समुद्र तट के बिलकुल किनारे पर स्थित है या फिर कहें तो समुद्र के भीतर ही स्थित है I और अरब सागर में जब भी जैसे ही जवार भाटा उठता है भोलेनाथ अरब सागर में मानों कुछ देर के लिए समाधि में चले जाते हैं और जैसे ही ज्वार भाटा शांत होता है देवाधिदेव एक बार फिर से अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए उनके सामने हाजिर हो जाते हैं I आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि यह कोई नई बात नहीं हैं यह प्रक्रिया सदियों से ऐसे ही निरंतर चली आ रही हैं लेकिन भोले नाथ का यह मंदिर अपनी जगह पर वैसे ही जैसे कि इनका नाम हैं “स्तंभेश्वर” एक अविचल और अडिग स्तम्भ की भाँती भक्तों के लिए खड़े हुए हैं I इस पवित्र तीर्थ के बारे में ‘श्री महाशिवपुराण’ में रुद्र संहिता भाग-2, अध्याय 11, पेज नं. 358 में भी उल्लेख किया गया हैं I

 

यहाँ पर आपको यह जानकारी दे देना अत्यंत आवश्यक हैं कि इस पवित्र मंदिर की खोज तक़रीबन आज से 150 से भी अधिक सालों पहले हुई थी I इस मंदिर में स्थित शिवलिंग की उंचाई तक़रीबन 4 फिट हैं और इस शिवलिंग का व्यास तक़रीबन 2 फिट का हैं I मंदिर के समीप से आपको अरब सागर का बेहद सुंदर नजारा देखने को मिल सकता है I यहाँ पर इस मंदिर के दर्शन के लिए पर्चे बाटे जाते हैं जिन पर्चों एमिन ज्वार-भाटा आने का समय लिखा होता है। ऐसा इसलिए किया जाता है, ताकि यहां आने वाले श्रद्धालुओं को परेशानियों का सामना न करना पड़े।

क्या है इस मंदिर की पौराणिक मान्यता –

पौराणिक मान्यताओं की बात करें तो इस मंदिर के बारे में लिखा गया हैं कि एक राक्षस था जिसका नाम तड़कासुर था जिसने भगवान भोले नाथ की घोर तपस्या करके उन्हें प्रसन्न कर लिया था और उनसे वरदान में यह मांग लिया था कि उसकी म्रत्यु केवल और केवल भोले नाथ के ही पुत्र के हाथों से हो और अन्य कोई उसे मार न सके I भोले नाथ उसकी तपस्या से इतना अधिक प्रसन्न थे कि उन्होंने उसे वरदान दे दिया I वरदान पाते ही तड़कासुर ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया देव, ऋषि, मनुष्य सभी को उसने परेशान करना शुरू कर दिया देवताओं से उसका भयंकर युद्ध हुआ लेकिन देवताओं को उसने पराजित कर दिया और देव लोक पर विजय पा ली I

 

जिस समय तड़कासुर चारों ओर आतंक फैला रहा था उस समय भगवान् भोलेनाथ ने सती का त्याग करके समाधि में लीन थे अतः सभी देवों ने भगवान् विष्णु से प्रार्थना की किसी भी प्रकार से भोले नाथ को समाधि से जगाया जाय और उनका विवाह करवाया जाय I तभी देवताओं ने भोले नाथ की तपस्या को भंग करने के लिए काम देव को भेजा लेकिन शंकर ने तीसरी आँख खोलकर कामदेव को भष्म कर दिया तभी भगवान् विष्णु ने भोले नाथ को समझा बुझा कर शांत किया और फिर उन्हें पार्वती से विवाह करने के लिए राजी किया I

 

भगवान् भोले नाथ और भगवती पार्वती के सयोंग से जिस संतान का अवतरण हुआ उसका नाम था कार्तिकेय जिनके 6 मस्तिष्क, चार आंख, बारह हाथ थे। कार्तिकेय ने ही मात्र 6 दिन की आयु में ताड़कासुर का वध किया। लेकिन जब कार्तिकेय ने ताड़कासुर का वध कर दिया तब उन्हें पता चला कि ताड़कासुर तो देवाधिदेव महादेव का बहुत बड़ा भक्त था I यह सब जानकार कार्तिकेय को काफी दुःख हुआ और उन्होंने प्रायश्चित करने की बात कही फिर भगवान विष्णु ने कार्तिकेय से कहा कि वे वधस्थल पर शिवालय बनवा दें। इससे उनका मन शांत होगा। भगवान कार्तिकेय ने ऐसा ही किया। फिर सभी देवताओं ने मिलकर महिसागर संगम तीर्थ पर विश्वनंदक स्तंभ की स्थापना की, जिसे आज स्तंभेश्वर तीर्थ के नाम से जाना जाता है।

 
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