किस्सा चंदौली के ‘यादव सिंह’ का : मल्टीनेशल कंपनी की तर्ज पर था वसूली सिंडिकेट

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g>वाराणसी (ब्यूरो) आम तौर पर माना जाता हैै कि घूस की रकम टेबिल के नीचे से ली जाती है और इसका कोई हिसाब नहीं होता। लेकिन चंदौली के एआरटीओ आरएस यादव ने इस मिथक को तोड़ दिया था। किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी की तर्ज पर उनका सिंडिकेट चलता था। चंदौली पुलिस के हाथ जो इंट्री रजिस्टर लगा है उससे चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं। इसके अलावा रविवार को पुलिस की छापेमारी में बरामद दस्तावेज कुछ अलग ही कहानी बयां कर रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक वसूली करने वालों की शिफ्टवार ड्यूटी होती थी। मार्केटिंग एजेंट के तौर पर दर्जनों लोग टोकन बेचने से लेकर उसका पैसा जमा कराने में जुटे थे। सूत्रों के मुताबिक रोजाना एक से डेढ़ लाख की रकम सिर्फ टोकन की आती थी जिसे लैपटॉप पर दर्ज किया जाता था। घूस के बकाये का बाकायदा कालम बना था और चाटर्ड एकाउटेंट इसका हिसाब रखता था।

दर्जनों की संख्या में थे मार्केटिंग एजेंट
परिवहन विभाग के सूत्रों का कहना है कि वसूली का सिंडिकेट सिर्फ चंदौली तक सीमित नहीं था बल्कि पूरे पूर्वांचल में तार जुुड़े थे। छापेमारी में बरामद दस्तावेज भी इसकी पुष्टि कर रहे हैं। हर जिले में खास पेट्रोल पंप और धर्मकांटा पर एजेंट रहते थे। दस प्रतिशत कमीशन पर यह कोड के रूप में टोकन देते थे। यह सिंबल के रूप में होता था जिसे क्रास चेक करने की खातिर कम्प्यूटर में इंट्री कराने के साथ प्रिंटर से शीट निकाली जाती थी। इसमें हजारों ट्रकों के नंबर रहते थे। किस माह का पैसा दिया है और कब का बकाया है पूरा ब्योरा रहता था। किसी सीईओ की तर्ज पर रोजाना इसे ‘साहब’ के सामने पेश किया जाता था। चर्चाओं पर यकीन करें तो सपा के शासनकाल में सीधे पंचम तल तक धन जाता था और स्थानीय स्तर पर किसी की हैसियत नहीं थी कि कुछ कहने की हिम्मत जुटा सके।

करीबियों ने ही कबूल किया काला कारनामा
चंदौली पुलिस ने अवैध रूप से वसूली करने वालों को हिरासत में लेकर कड़ाई से पूछताछ की तो उन्होंने एक-एक कर एआरटीओ के काले कारनामे गिनाने शुरू कर दिये। पुलिस विश्वास नहीं कर पा रही थी कि भ्रष्टाचार का इस कदर संंस्थागत रूप भी हो सकता है। गिरफ्तार लोगों की माने तो प्रति ट्रक आठ से दस हजार रुपये टोकन के रूप में लिये जाते थे। इंट्री रजिस्टर में हजारों ट्रकों का हिसाब है जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि प्रतिमाह कितने की वसूली थी।

रिपोर्ट – सर्वेश कुमार यादव

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