संघर्ष गाथा- झुग्गी में रहने वाली उम्मुल खैर के IAS बनने की

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photo credit and story inputs from BBC.COM

नई दिल्ली- यह कहानी है भारत की उस बेटी की जिसका बचपन कभी दिल्ली की झुग्गियों में बीता था, यह संघर्ष गाथा है उस बहादुर लड़की की जो एक मुस्लिम रूढ़िवादी निम्न परिवार से आती है, जहाँ लड़कियों का अधिक पढना लिखना यह समझा जाता है कि लड़की ज्यादा पढ़ लिख लेगी तो बुजुर्गों का सम्मान नहीं करेगी |

गौरव गाथा है एक ऐसी बहादुर लड़की की जिसने कभी भी परिस्थितियों के सामने घुटने नहीं टेके बल्कि परिस्थितियों ने हमेशा उसके सामने अपने घुटने टेके | यह जीवन परिचय है एक ऐसी बालिका की जिसके नन्हे से जीवन काल में ही उसे ऐसी गंभीर बीमारियों ने जकड लिया जहाँ छोटी सी छोटी चोट लगने से उसे फैक्चर होने का डर बना रहता था | यानी हड्डियाँ बेहद ही कमजोर हो गई थी | यह कहानी उसी उन्मुल खैर की है जिसने जन्म तो राजस्थान में लिया लेकिन उसका पालन पोषण दिल्ली के एक गंदे नाले के किनारे बसी झुग्गियों में हुआ और जिसने इसी वर्ष भारत की सबसे बड़ी परीक्षाओं यूपीएससी की सिविल सेवा परीक्षा को पास कर इस देश की भावी आईएएस अफसर बनी |

उन्मुल खैर के बारे में आपको बता दें कि उन्मुल का जन्म राजस्थान में हुआ था लेकिन उनका लालन-पालन हज़रत निजामुद्दीन दरगाह के पास बसी झुग्गियों में हुआ था | इनके पिता यही हज़रत निजामुद्दीन स्टेशन के बाहर ही कुछ फुटकर सामन बेंचा करते थे और माँ जैसे तैसे अपना घर चलाती थी | लेकिन कुछ दिनों बाद ही दिल्ली सरकार के आदेश पर उनकी झुग्गियों को वहां से उजाड़ दिया गया और अब उन्मूल और उनके परिवार के ऊपर छत जिसके सहारे वह अपना जीवन गुज़ार रहे थे वह भी ख़त्म हो चुका था |

घर के समाप्त होने के बाद उन्मुल अपने माता-पिता के साथ त्रिलोकपुरी आ गयी और यही एक छोटा सा सस्ता रूम लेकर रहने लगे | लेकिन तभी इनके पिता का काम भी छूट गयी और जिसकी वजह से घर चलाना मुश्किल हो गया था | ऐसे में घर चलाने की जिम्मेदारी उन्मुल ने अपने नन्हे-नन्हे कन्धों पर उठाया और उन्होंने अपने आस-पास रहने वाले छोटे-छोटे बच्चों को ट्यूशन देना प्रारंभ कर दिया | इस समय उन्मुल मात्र सातवीं की छात्रा थी | उस ज़माने में उन्मुल को एक ट्यूशन का महज़ 50-60 रुपया ही मिलता था और ऐसे में घर चलाना बड़ा ही मुश्किल हो गया था | इसी दौरान उन्मुल की सगी माँ का भी देहांत हो चुका था और वे अब अपनी सौतेली माँ के साथ रहती थी | उन्मुल बताती है कि जब वे आठवीं की कक्षा की छात्रा थी तभी उनके माता-पिता ने उनकी पढ़ाई छोड़वा देने की बात कही थी और उन्हें वापस राजस्थान भेजने के लिए कहा गया |

ज्यादा पढने के बाद लड़की अदब करना भूल जाती है –
उन्मुल कहती है कि पुराने ख़यालात के मुश्लिम परिवारों में आज भी यह माना जाता है कि यदि लड़की ज्यादा पढ़ लिख लेगी तो वह अपने से बड़ों का अदब करना भूल जायेगी | वगैरह…वगैरह…वगैरह…उन्मुल ने बीबीसी से बात करते हुए कहा है कि मेरी नई माँ कहती थी कि मुझे अब वापस राजस्थान भेज दिया जाएगा | क्योंकि मेरे पैर बहुत ही कमजोर थे इसीलिए घरवालों का कहना था कि मैं सिलाई का काम सीखूं लेकिन मैंने पहले ही तय कर लिया था कि अब अगर मैं जिन्दा रहूंगी तो पढ़ाई करुँगी अन्यथा अपनी जान दे दूँगी |

इसके बाद नौवीं क्लास में ही उन्मुल को अपना घर छोड़ना पड़ा और वे अकेले ही रहने लगी | इन्होने ट्यूशन पढ़ाते हुए अपनी पढ़ाई आगे जारी रखी | उन्मुल दिन में स्कूल जाती थी और रात में वे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती थी | स्कूल में उन्मुल को स्कालरशिप मिलने लगी, उन्मुल ने इस दौरान अपने स्कूल में टॉप भी किया था | इसके बाद इन्होने दिल्ली यूनिवर्सिटी से अप्लाइड साइकॉलजी में बीए किया |

आर्थिक हालात खाराब होने की वजह से नहीं कर सकी एमए-
उन्मुल कहती है कि दिल्ली विश्वविद्यालय से बीए करने के बाद मैं साइकॉलजी से एमए करना चाहती थी लेकिन आर्थिक हालात खाराब होने की वजह से ऐसा कर पाना संभव नहीं था | क्योंकि साइकॉलजी में इंटर्नशिप की आवश्यकता पड़ती है और उन्मुल के पास पैसे की बड़ी दिक्कत थी, इस समस्या के चलते उन्मुल जेएनयू पहुंची और यहाँ से उन्होंने इंटरनैशनल रिलेशन्स में एमए किया |

जेएनयू आना मेरे जीवन का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ-
उन्मुल कहती है कि जेएनयू आना मेरे जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट था | उन्होंने कहा कि यहाँ पर मुझे रहने के लिए हॉस्टल मिला और खाने के लिए मेस तथा अन्य तमाम सुविधायें मिली | उन्मुल ने जेएनयू में रहते हुए कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर विकलांग समुदाय का नेत्र्तत्व किया जिसके चलते ही इन्हें एक साल के लिए जापान में रहने का भी मौका मिला | जापान से वापस आने के बाद उन्मुल ने तय किया कि वे अब आईएएस की तैयारी करेंगी और आज उन्होंने अपने सपने को पूरा कर लिया है |

उन्मुल का कहना है कि मैं खुद को बहुत ही खुशकिस्मत मानती हूँ क्योंकि मुझे मुश्किल हालातों के बावजूद भी पढने का मौक़ा मिला है | वह यह भी कहती है कि यदि आप अपने मकसद को पाना चाहते है तो आपके भीतर उसे पाने के लिए जुनून होना चाहिए | आप अपने सकारात्मक पक्ष को इतना अधिक मजबूत बना दें कि उसके सामने दुनिया की बाकी सभी चीजें बौनी नज़र आने लगें | वह कहती है कि यदि आप कोई सपना देखें तो उसके प्रति पूरी ईमानदारी बरते आगे बढ़ने की प्रेरणा स्वतः ही आपको मिलने लगेगी |

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