‘नौकरशाही पर नकेल’ का पहला प्रयास ‘फेल’

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देहरादून (ब्यूरो)-  हमने अभी हाल में ही में नौकरशाही के चरित्र के बारे में बताया था। नौकरशाही घोड़े की तरह होती है जो अपने सवार की गर्मी को महसूस करने के बाद ही अपनी चाल का फैसला लेती है। घोड़े को यदि भान हो जाये  कि उसके सवार में दम नहीं है तो घोड़ा उस पर हावी हो जाता है। इसी तरह नौकरशाह को यदि पता चल जाता है कि जिस मंत्री के मातहत में वह काम कर रहा है, उसमें आवश्यक जानकारी का अभाव है तो वह मनमानी शुरू कर देता है।

मंगलवार को अल्मोड़ा में जो कुछ भी हुआ वह नौकरशाही की इसी मनोदशा का सबूत है। प्रदेश में नवगठित भाजपा सरकार में राज्य मंत्री रेखा आर्या ने मंगलवार को अल्मोड़ा में विकास कार्यों को लेकर समीक्षा बैठक की। इस बैठक में डीएम सविन बंसल और एसएसपी डीएस कुंवर समेत जिला स्तर के लगभग सभी अधिकारी मौजूद रहे। जिले की तरक्की को लेकर हुई बैठक का लब्बोलुआब यह रहा कि मंत्री जी ने जिस किसी भी मामले में अधिकारियों को निर्देश देना चाहा उन सभी विषयों पर अधिकारियों ने उन्हें आईना दिखा दिया।

मंत्री ने शहर की वन वे यातायात व्यवस्था को बदलने की बात कही तो इसे जनता की इच्छा बताकर अधिकारियों ने उनके निर्देश को खारिज कर दिया। मंत्री ने सड़क सुरक्षा की बात की तो डीएम ने उन्हें सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन की याद दिला दी। मंत्री ने डीएम के फोन रिसीव नहीं करने की आदत पर सवाल किये तो डीएम ने जनता की राय जानने की सलाह दे डाली। एक मुकदमे की प्रगति के संबंध में मंत्री ने जानना चाहा तो इसे सार्वजनिक रूप से बहस करने विषय नहीं मानते हुए डीएम ने कुछ भी जानकारी देने से इनकार कर दिया।

कुल मिलाकर अपनी अध्यक्षता में आयोजित हुई  मीटिंग से मंत्री महोदया को मायूस होकर लौटना पड़ा। संवैधानिक व्यवस्था के तहत डीएम को इस बात का कतई अधिकार नहीं है कि वह मंत्री को इस तरह से जलील करे। परंतु डीएम भी संवैधानिक व्यवस्था का ही अंग होता है और उसे भी कई अधिकार मिले हुए हैं। सरकार चलाने वाले मंत्री को सबसे पहले इस बात की जानकारी लेनी होगी कि उनके अपने दायित्व क्या है और उनकी सीमाएं क्या है। साथ ही विकास संबंधी कतिपय मापदंडों को भी उसे समझना होगा।

मंगलवार को मंत्री रेखा आर्या की अध्यक्षता में आहूत बैठक का निचोड़ यही है कि उन्होंने बैठक से पहले कोई होमवर्क नहीं किया था। सूत्रों की मानें तो बैठक के बहाने वह आला अफसरों को हड़काने के लिए वहां पहुंचीं थीं। क्योंकि बताते चलें कि रेखा आर्या के पति गिरधारी लाल का एक मुकदमा लंबित चल रहा है। पिछले साल जब वह कांग्रेस छोड़कर भाजपा में चली गयीं थीं उसके बाद उनके पति के खिलाफ पुलिस की दबिश भी बढ़ गई थी। रेखा आर्या और कतिपय भाजपाइयों का मानना है कि तत्कालीन सीएम हरीश रावत के इशारे पर उनके पति के खिलाफ पुलिस ने उत्पीड़नात्मक कार्रवाई की थी।

अब रेखा आर्य भाजपा सरकार में मंत्री हैं। वह अपने पति के खिलाफ की गई कार्यवाही के एवज में पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों से हिसाब बराबर करना चाहती हैं। मंगलवार को अल्मोड़ा में समीक्षा बैठक का असल उद्देश्य यही था। परंतु उनसे गलती यह हो गयी कि बगैर किसी होमवर्क के वह मीटिंग में पहुंच गयीं। लिहाजा उन्होंने जिस मुद्दे पर डीएम या एसएसपी को घेरना चाहा उसी मुद्दे पर उऩ्हें बैकफुट पर आऩा पड़ा।

डीएम ने तो यहां तक कह दिया कि मैडम आप मुझे हटवा दें और किसी दूसरे डीएम को यहां तैनाती दिला दें। मंत्री के लिए इससे बड़ी बेइज्जती और क्या हो सकती है। कहने का मतलब यह है कि सीएम त्रिवेन्द्र सिंह रावत को यदि वास्तव में शासन व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन लाना है और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़नी है तो उन्हें सबसे पहले अपने मंत्रियों को अप़डेट करना पड़ेगा। पर्याप्त जानकारी के अभाव में बाकी मंत्रियों का भी वही हाल होगा जो मंगलवार को रेखा आर्या का हुआ। आप बदलते रहिये डीएम और एसएसपी। उनके बदले में किसी आईएएस और आईपीएस ही डीएम-एसएसपी की कुर्सी मिलेगी। विषय वस्तु के प्रति मंत्री के समुचित ज्ञान और जानकारी ही नौकरशाही को काबू में रख सकता है। वरना नौकशाह तो होते ही हैं घोड़े की तरह।

रिपोर्ट- मो. शादाब
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