बनारस के नव दलित आंदोलन के ‘प्रणेता’ डा. लेनिन को फ्रांस का सरकार ने दिया बड़ा सम्मान

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वाराणसी : लंबे समय से दलितों के अधिकारों और मानवाधिकार के लिए संघर्ष करने वाले पीवीसीएचआर के सीईओ डा. लेनिन रघुवंशी को फ्रांस की सरकार की तरफ से बड़ा सम्मान मिला है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की एनजीओ कोर कमेटी के पूर्व सदस्य भूमिका निभा चुके डा. लेनिन को यह सम्मान भारत में दलित अधिकारों और मानवाधिकार के सजग प्रहरी के के रूप में अपनी भूमिका पूरी तरह से निवर्हन करने के चलते दिया जा रहा है। पुरस्कार समारोह नई दिल्ली में 10 दिसंबर को होगा जहां फ्रांसीसी राजदूत पदक और प्रमाणपत्र प्रदान करेंगे। फ्रांस की सरकार ने डा. लेनिन को मानवाधिकार के लिए पुरस्कार ‘मानव अधिकार के रक्षकों’ के रूप में चुना है जो उनके ही नहीं बल्कि देश के लिए एक बड़ी उपलब्धि है।

तीन दशक पहले शुरू हुआ था पुरस्कार
गौरतलब है कि 1988 से आरम्भ हुआ यह पुरस्कार फ्रांस या दूसरे किसी देश अथवा क्षेत्र में किये गये काम के अकलन पर दिया जाता रहा है। डा. लेनिन ने इस बाबत पूछने पर स्वीकार किया कि यह पुरस्कार भले ही उनके व्यक्तिगत प्रयासों की मान्यता के रूप में दिया गया हो लेकिन वास्तविकता यह है कि भारत के संग दक्षिण एशिया में मानवाधिकारों के बचाव के सामूहिक कार्य के लिए मिल रहा है। यह जाति व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई का सम्मान है जो दक्षिण एशिया में फासीवाद के मुख्य कारणों में से एक है।

खत्म होनी चाहिये जाति व्यवस्था और पितृसत्ता
उत्तर प्रदेश के पिछड़े इलाके समझे जाने वाले पूर्वांचल में जन्मे डा. लेनिन का मानना है कि जाति व्यवस्था और पितृसत्ता के आधार पर भेदभाव पूरी तरह समाप्त हो जाना चाहिए। भारतीय आध्यात्मिक नेताओं से प्रेरित नव दलित आंदोलन जो देश के बाहर भी फैलता जा रहा है का नेतृत्व पीसीवीएचआर के संस्थापक के रूप में उनके अनुभव से आता है। यह अहिंसक संगठन दलित (भारतीय जाति व्यवस्था में अस्पृश्य) और जनजातियों के मुद्दों पर केंद्रित है। आयुर्वेद, आधुनिक चिकित्सा और शल्य चिकित्सा में स्नातक डा. रघुवंशी 23 साल की उम्र के बाद से सामाजिक और आर्थिक न्याय के लिए समर्पित है। उनकी दूरदृष्टि एक बेहतर भविष्य में आशा और विश्वास के निर्माण में रही है।

रिपोर्ट – राजकुमार गुप्ता

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