मूलभूत सुविधाओं से वंचित है आदिम जनजाति बाहुल धोबरनी टोला

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जरमुंडी(ब्यूरो)– भारत को अंग्रेजों के चंगुल से आजाद हुए पचासों वर्ष बीत चुका है किंतु आज तक झारखंड राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी मूलभूत सुविधाओं का अभाव अस्पष्ट नजर आता है । ताजा उदाहरण दुमका जिला के जरमुणडी प्रखंड अंतर्गत चमराबहियार पंचायत के नवाडीह गांव के आदिम जनजाति बाहुल धोवरनी टोला के लोग आज के युग में आदिम जमाने की जिन्दगी जीने को मजबूर हैं । प्रशासनिक व्यवस्था गला फाड़ के ढिंढोरा पीटता हो कि हम स्वच्छ और समृद्ध भारत की ओर अग्रसर हैं किंतु धोबरनी टोला जैसे अनेकों गांव इस बात की गवाही देते हैं कि भारत अभी भी गरीबी औऱ दलालों के चंगुल से मुक्त नहीं हो पाया है ।

इस गांव की बदहाली के संबंध में कूलो देवी, विनोद पूजहर, बादल पूजहर , देवा पूजहर ,अर्जुन पूजहर आदि ग्रामीणों का कहना है कि भारतीय संविधान में वर्णित मूलभूत सुविधा जैसे स्वच्छ पेयजल, आवागमन हेतु सड़क मार्ग, शौचालय एवं प्रकाश की पूर्ण व्यवस्था आदि का इस गांव में अभाव है। ग्रामीणों ने बताया कि गांव में एक चापाकल है किंतु एक साल से इस चापाकल ने पानी देना बंद कर दिया है| इससे हम गरीब ग्रामीण जोरिया का गंदा पानी स्वच्छ पेयजल के रूप में ना चाहते हुए भी उपयोग में ला रहे हैं। वही भारत सरकार की हर गाँव को मुख्य सड़क से जोड़ने की योजना के अंतर्गत आज तक हमारे गांव को मुख्य सड़क से जोड़ने के लिए पगडंडी के सिवा दूसरा और कोई चारा नहीं है| वह भी सिर्फ दिन के उजाले में क्योंकि गांव में प्रकाश की सुविधा हेतु बिजली पोल लगाया गया बिजली पोलो में तार का जाल बिछाया गया किंतु उन तारों का क्या जो आज तक बल्ब के रूप में नहीं जला और तो और स्वच्छ भारत अभियान का दंभ भरने वाले केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा इन आदिम जनजाति बहुल गांव में आज तक एक भी लाभुकों को शौचालय नसीब नहीं हो सका है।

पेयजल की समस्या से जूझ रहे इस गांव की विधवा महिला फुलमनी देवी का कहना है कि कुछ महीने पहले जब मेरे पति स्वर्गीय दुखो पूजहर का आकस्मिक देहांत हो गया तो हम टोले वालों ने कई बार चापाकल मरम्मत कराने के लिए विभागीय सहित स्थानीय मुखिया पूनम मरांडी जो हमारे गांव के समीप ही निवास करती हैं, से भी आग्रह किया लेकिन मुखिया ने दो टूक जवाब देकर यह कहा कि अभी फुर्सत नहीं है जाओ जैसे व्यवस्था करना है अपने स्तर से करो मुखिया के इस तरह के भेद पूर्ण व्यवहार से त्रसित हो कर अपने पति के श्राद्ध के लिए जोरिया सहित गांव के गंदे कुएं का पानी का उपयोग कर किसी तरह भोज भंडारा का आयोजन किया। ऐसे में भारतीय संविधान में वर्णित मूलभूत सुविधाओं का क्या औचित्य रह जाता है। इस इससे भला तो अंग्रेजों का 200 साल अच्छा था जिसने सैकड़ों खंड में बँटे भारत को एक राष्ट्र के रूप में जोड़कर सिखाया कि भारत को गरीबी एवं गंदगी से कैसे मुक्त करें।

रिपोर्ट- धनंजय कुमार सिंह

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