धार्मिक अस्था एवं ऐतिहासिक महत्व की धरोहर माता संदोही देवी मंदिर, असली आल्हाखण्ड में मिलता है इस मंदिर का उल्लेख

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बीघापुर(उन्नाव)- कस्बे में कुछ ऐसी ऐतिहासिक,धार्मिक,प्राचीन धरोहरे हैं जो कभी क्षेत्र में प्राचीन काल से चर्चा का विषय हैं।कस्बे के ही नहीं दूर दराज के लोग भी इन स्थानों में आकर उनके ऐतिहासिक महत्व को जानने समझने व देखने के लिए आया करते हैं।

हमारे संवाददाता डाॅ0 मान सिंह ने बीघापुर कस्बे के कुछ प्राचीन व ऐतिहासिक तथा धार्मिक स्थलों का भ्रमण किया और कस्बे के बुजुर्गों से उन स्थानों का इतिहास जानने का प्रयास किया। कस्बे के इन प्राचीनतम स्थलों में से सबसे पहले बात कर रहे हैं संवत् 1024 के माता संदोही देवी मंदिर की। कहा जाता है कि इसकी स्थापना बंजारा समाज के लोागों ने मुगल षासन काल से पहले कराया था परन्तु सही जानकारी किसी को भी नहीं है।लगभग 1048 वर्ष पुराने इस विषाल मंदिर का अनोखा इतिहास है । कस्बे में प्रवेष करते ही पष्चिम दिषा में बने इस मंदिर के विषय में बताया जाता है यह प्रचीनकाल में घने जंगलों से घिरा था।इसका उल्लेख ऐतिहासिक आल्हाखण्ड में मिलता है। सर्वप्रथम प्रकाषित आल्हाखण्ड जिसे असली आल्हाखण्ड कहा जाता है संवत् 1921 में देवनागरी लिपि में मंुषी राम स्वरूप के द्वारा तत्कालीन अंग्रेज अफ्सर साहब बहादुर मिस्टर सी0ई0 इलिएट जो कि फरुक्खाबाद का बन्दोबस्त कलेक्टर था, उसकी अनुमति पर प्रकाषित किया गया था। इसी अंग्रेज अफ्सर ने इस आल्हा खण्ड को अंग्रेजी में अनुवाद करा कर लंदन भेज दिया था। तत्कालीन अंगे्रज अफ्सर के अनुवाद कराए गए असली आल्हाखण्ड में संवत् 1921 में माता सन्दोही देवी की महत्ता का वर्णन मिलता है। यह अंग्रेज अफ्सर मिस्टर सी0ई0 इलिएट अपनी डायरी में यह भी लिखता है कि बीघापुर का माता संदोही देवी का यह मंदिर विद्रोहियों का बड़ा केन्द्र है जो कि अंगे्रजी सरकार के खिलाफ षड़यन्त्र करते हैं अर्थात आज से 151 वर्ष पूर्व अंग्रेजों की निगाह में भी माता सन्दोही का दरबाद खटकता था। इस संवत् 1921 में प्रकाषित असली आल्हा खण्ड को पं0 भेालानाथ जी व लखीमपुर खीरी ’अवध’ के नारायण प्रसाद सीताराम जी ने पुनः कुछ संषोधनों के साथ प्रकाषित किया था इसके दस्तावेजीय प्रमाण भी हैं।

बुजुर्ग यह भी बताते हैं कि घने जंगलों के बीच छिपे होने के कारण अंग्रेजों के खिलाफ क्रान्तिकारी अपनी रणनीतियों को यहीं इसी माता संदोही देवी मंदिर में बैठकर अंजाम दिया करते थे। मंदिर के उत्तर दिषा में विषाल तालाब है जिसमें पक्का घाट भी बना है। कालान्तर में इसी तालाब से लोग अपनी प्यास बुझाया करते थे। वहीं पास ही बना यात्री विश्रामालय/बारादरी दूरदराजा से आने वाले यात्रियों के लिए आज भी सुकून देती है । कस्बे के बुजुर्ग बताते हैं कि आज से लगभग 100 वर्ष पहले षिवबालक नम्बरदार ने मंदिर के आसपास के जंगल को साफ करा कर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन षुरू कराया था। तब से लेकर आज तक उन सांस्कृतिक कार्यक्रामों का आयोजन हो रहक हैं। बुजुर्ग बताते हैं कि साहित्य के क्षेत्र में भी इस मंदिर का विषेष महत्व रहा है। कबीर की तरह अनपढ़ कवि कालीदीन ने इसी मंदिर की सीढ़ियों में बैठकर सैकड़ों छन्दों की रचना की परन्तु उस जमानें में कहीं कोई प्रकाषन की व्यवस्था न होने के कारण उनकी कोई भी पाण्डुलिपि धरोहर के रूप में कस्बे में कहीं भी संरक्षित नहीं है या यूं कह लिया जाये कि संरक्षित करने का प्रयास नहीं किया गया। आधुनिक समय में स्व0 काका बैसवारी ने इसी मंदिर से अपनी काव्य यात्रा को प्रारम्भ कर पूरे भारत में ख्याति अर्जित की थी। मंदिर के साथ क्षेत्र के लोगों के आकर्षण का केन्द्र मंदिर परिसर में खड़े विषालकाय देव वृक्ष तथा नीम व पाकड़ के पेड़ दूरदराज के याात्रियों को विश्राम देकर उनकी थकान हरने का कार्य करते हैं।

इस वर्ष माता का 96वां वार्षिकोत्सव 20, 21 व 22 मार्च को होगा जिसमें विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम व उ0प्र0 की लोक नाट्य कला नौटंकी का आयोजन भी प्रत्येक वर्ष की भांति होगा। उक्त कार्यक्रम श्री संदोही देवी मेला कमेटी द्वारा आयोजित किये जाएंगे।

रिपोर्ट- मनोज सिंह

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