संघर्षों की गाथा:बच्चों के भविष्य में गरीबी को नहीँ बनने दिया बाधा अभावों में भी बच्चों को पढ़ाकर बनाया काबिल

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kaabil

हरहुआ/वाराणसी (ब्यूरो)– कहते हैं की गरीबी में इंसान के सामने सबसे ज्यादा चिंता परिवार के पालन और बच्चों के परवरिश को लेकर होता है | कई बार तो गरीबी के आगे लोग इतना बेबस हो जाते हैं की उन्हें बच्चों की परवरिश करना बड़ी मुश्किल लगने लगता है और सब कुछ भूलकर परिवार के जीविका के लिये बच्चो को भी काम पर लगाना पड़ता है | लेकिन इसी समाज में कुछ लोग ऐसे भी देखने को मिल जाते हैं जो हर तकलीफ को झेलकर भी अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य का सपना न सिर्फ देखते हैं बल्कि उसे पूरा करने का पूरा जतन भी करते हैं | ऐसे ही एक शख्स हमे देखने को मिले विकास खंड हरहुआ अन्तर्गत औरा गाँव में | औरा गाँव के रहने वाले 78 वर्षीय बुजुर्ग राजदेव गोंड गरीबी में जीने के बावजूद भी अपने बच्चों की परवरिश में कोई कमी नहीँ आने दी | आसपास के लोगों का कहना है की बच्चों को पढाने के लिये जहाँ वे पेट्रोल पम्प पर नौकरी करते किया तो वहीं उनकी पत्नी स्व. हीरावती देवी गाँव में दाना भूजकर बच्चों की पढाई में मदद की | राजदेव बताते हैं की गरीबी और अभाव उनको विरासत में मिली लेकिन वे अपने बच्चों को पढ़ा लिखाकर कामयाब इंसान बनाने की चाहत अपने दिल में पाले रखे थे | उन्होंने बताया की परिवार की स्थिति बच्चों को पढाने की इजाजत नहीँ देती थी फिर भी मैंने हार नहीँ मानी और बच्चों की पढाई में गरीबी को बाधक नहीँ बनने दिया | 3 लड़के और एक लड़की के परिवार को पेट्रोल पम्प पर काम करके पढ़ाना आसान नहीँ था फिर भी उन्होंने संघर्ष किया | बच्चों की परवरिश में उनकी पत्नी ने भी बखूबी साथ दिया और उनके बच्चों ने भी माँ बाप के त्याग को बेकार नहीँ जाने दिया| उनके संघर्षों के परिणाम स्वरूप आज उनके बच्चे न सिर्फ अपने पैरो पर खड़े हुए बल्कि समाज में अपना अच्छा स्थान भी बनाया है | तीन लड़कों में सबसे बड़े शिव जतन गोंड ने 12वीं तक पढ़ने के बाद पिता का हाथ बटाने की कोशिश करने लगे और पेंटिंग का काम सीखकर छोटे बड़े काम का ठेका लेने लगे तो वहीं दूसरा लड़का शिवकुमार गोंड ने भी स्नातक करने के बाद छोटे भाई की पढाई में योगदान देने के लिये पढाई छोड़ कर सिलाई का काम पकड़ लिया और आज वह खुद की दुकान बनाकर कपड़े सिलने का काम करते हैं | बड़ी बहन निर्मला ने भी भाई की पढाई के लिये अपनी पढाई छोड़ दी | वहीं सबसे छोटे लड़के संजय गोंड ने पिता के मेहनत को सफल करते हुए बी एड करने के बाद सहायक अध्यापक के पद पर नियुक्ति प्राप्त कर ली | संजय ने सिविल सेवा की परीक्षा को भी दो बार सफलता पूर्वक पास किया लेकिन साक्षात्कार में असफल हो गया,ए डी ओ सहकारिता के पद पर नियुक्ति पाने वाले संजय ने सहायक अध्यापक पर ज्वाइन कर आगे की तैयारी के लिये आज भी संघर्षरत हैं | संजय कहते हैं की पिता की मेहनत को साकार करने के लिये हर सम्भव प्रयास किया अब अपने पिता जी की सेवा करके उनकी मेहनत का फल देने की इच्छा है,संजय की माता हीरावती का तो देहांत हो गया है जिसका उन्हें अफसोस है की माँ की सेवा नहीँ कर सका | वहीं राज़देव बेटे की सफलता पर गर्व से प्रफुल्लित होते हुए कहते हैं की बच्चों ने उनके त्याग और परिश्रम को सफल बना दिया और अब मुझे अपने संघर्षों पर बहुत गर्व होता है | बच्चे भी उनके परिश्रम का सम्मान करते हैं और उनकी बुढापे में खूब देखभाल भी करते हैं |

रिपोर्ट-नागेन्द्र कुमार यादव
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