बुराई से तौबा कर अल्लाह की इबादत करने का खास महीना ‘रमजान’

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जालौन(ब्यूरो)- बुराई से तौबा कर अल्लाह की इबादत करने का खास महीना ‘रमजान’ मुस्लिम समुदाय के लोगों के लिए विशेष महत्व रखता है। रमजान के महीने में की जाने वाली इबादत तथा इसके महत्व के संबंध में
मौलाना सुल्तान साहब बताते हैं कि रमजान इस्लामी कैलेंडर का नौवां महीना है। रमजान के महीने का रोजा कोई इंसान बिना किसी वाजिब वजह के छोड़ दे तो वह पूरी जिंदगी रोजा रखकर भी उसका सबाव नहीं पा सकता। रोजे का मतलब होता है तकवा। तकवा यानी अपने आप को बुराइयों से बचाते हुए भलाई को अपनाना।

शहर काजी मौलाना साबिर साहब बताते हैं कि रमजान के महीने में ही पाक कुरान शरीफ आसमान से उतारी गई थी। इसीलिए रमजान का महीना कुरान का महीना भी कहा जाता है। रमजान की रात में एक विशेष नमाज होती है, जिसे तराबीह कहते हैं। यह नमाज रात में इशां की नमाज कें बाद पढ़ी जाती है। रमजान के महीने में तराबीह की नमाज के दौरान पूरा कुरान पढ़ने या सुनने की अजीम बरकतें हैं।

इमाम मौलाना साकिब साहब कहते हैं कि रोजा केवल भूखे, प्यासे रहने का नाम नहीं है। रोजा इंसान के जिस्म के हर हिस्से का होता है। जैसे आँख का रोजा मतलब गलत मत देखो, कान का रोजा, गलत मत सुनो, मुँह का रोजा मतलब गलत मत कहो, हाथ का रोजा यानी गलत काम न करो, पैर का रोजा यानी गलत जगह मत जाओ यानी आपके पैर हमेशा अच्छाई की ओर ही बढ़ें। रोजे के दौरान जो बात सबसे खास होती है कि रोजे के दौरान रोजेदार को कोई बुरा काम ना तो खुद करना चाहिए साथ ही अगर कोई बुरा काम करता दिखे तो उसे भी जहाँ तक हो सके बुरे काम को करने से रोकना चाहिए। रोजा रखने वाले इंसान को हमेशा बुराई से तौबा करते रहना चाहिए।

जहांगीर आलम बताते हैं कि इंसान रोजा रखकर ऐसा बनने की कोशिश करता है, जैसा उसका रब चाहता है। रमजान का महीना बेहद पाक व रहमतों वाला होता है। इस महीने में की जाने वाली इबादत का सबाव और दूसरे महीनों में की जाने वाली इबादत से 70 गुना ज्यादा मिलता है। रमजान के महीने में अल्लाह बन्दों के लिए रहमतों के दरवाजे खोल देता है।

रिपोर्ट- अनुराग श्रीवास्तव 

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