सहज साधना के अनोखे योगी त्रिदण्डी स्वामी

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बलिया : साधना, उपासना एवं अराधना के सहज साधक त्रिदण्डी स्वामी का अवतरण 19वीं सदी के उत्तरार्ध की अनोखी घटना थी। सत्य, समाधान, योग और तप के बल पर प्रकृृति को भी नियंत्रित करने वाले ऐसे साधु ने अपने 120 वर्ष के जीवनकाल में कुल 79 चातुर्मास्य कर त्रेताकालीन लक्ष्मीनारायण यज्ञों की परम्परा को बनाये रखा। स्वामी जी में सूर का शौर्य, तुलसी की भावुकता, व्यास की विद्वता तथा बाल्मिकी का इतिहास बोध एक साथ समाहित था। त्रिदण्डी स्वामी को बागी भूमि बलिया से काफी लगाव था।

त्रिदण्डी स्वामी के शिष्य एवं गंगामुक्ति अभियान के राष्ट्रीय प्रभारी रमाशंकर तिवारी कहते है कि भारत में त्रिदण्डी स्वामी का प्रथम लक्ष्मीनरायण यज्ञ 1924 में महाराष्ट्र के बॉसफाड़ी तथा द्वितीय यज्ञ 1926 में बलिया जनपद के दोकटी गाँव में हुआ। इस प्रकार उन्होंने नगव, जवहीं, हल्दी आदि कई गाँवों में चातुर्मास्य कर भृगु भूमि की प्राचीन यौगिक परम्परा का निर्वहन कर सत्य का अनुसंधान किया। भौतिक चकरचौहा से दुर, बैरागा का अनोखा संसार सजाये त्रिदण्डी महाराज का सम्पूर्ण जीवन गंगातट पर ही गुजरा। आपने संस्कृत साहित्य में कुल दो दर्जन पुस्तकों की रचना कर विधि वैदिक परम्परा के अक्षुण्ण ज्ञान भण्डार को आमजन के अनुकूल बनाया। ब्रह्म विद्या उनके रग-रग में समाहित रही। स्वामी जी की 19वीं पुण्य तिथि रविवार 2018 अगहन कृष्ण दशमी रविवार को दिन में 10 बजे से भृगु मंदिर के वाचनालय में मनायी जायेगी।

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