हजारों वर्ष पहले ही भारत के ऋषियों ने आज के वायु यानों से बेहतर विमानों की खोज कर ली थी I

0
1118
Vaimanika_Shastra_Shakuna
भारद्वाज मुनि द्वारा रचित वैमानिक शास्त्र का शकुन विमान का स्क्रैच (photo credit -wikipedia.org)
182px-Vaimanika_Shastra_title_page
(photo credit -wikipedia.org)

 

“भारद्वाज मुनि द्वारा रचित वैमानिकी शास्त्र को आधार बना कर हम इस लेख को प्रदर्शित करने का प्रयास कर रहे हैं I क्योंकि दुनिया में सबसे पहले अगर विमानों के बारे में कोई वर्णन या फिर कहीं कुछ लिखा मिलता हैं तो वह हिन्दुओं के पवित्र ग्रन्थ और महर्षि भारद्वाज द्वारा लिखा गया यंत्र सर्वत्र का वैमानिकी का यह भाग I यहाँ जो कुछ भी लिखा हुआ हैं इस पार नासा ने भी रिसर्च की हैं और उसने भी यह स्वीकार किया हैं कि वासत्व में वैमानिक शास्त्र आज के वायुयान के विज्ञान से कहीं आगे की बता हैं I”

पूरी दुनिया यह मानती हैं कि वायुयान का आविष्कार अमेरिका के राईट बंधुओं ने किया हैं, जिन्होंने 17 दिसंबर 1903 पूरी दुनिया का पहला वायुयान बना कर तैयार किया था I इसीलिए लोगों का मानना हैं कि विमान के क्षेत्र में जो कुछ भी हो रहा हैं वह सब अमेरिका का दिया हुआ, जबकि सच यह नहीं हैं I दुनिया के सबसे अधिक प्राचीन ग्रंथों में भारत के ग्रंथों की गिनती हमेशा से ही पहले स्थान पर होती रही हैं I ऐसे आज हम आप सभी के सामने उन्ही पुराने ग्रंथों के माध्यम से लिखी गए बातें रखता हूँ जिन्हें पढ़कर आप स्वयं यह सुनिश्चित करें कि विज्ञान किसका सबसे आगे था, वायुयान की खोज पहले किसने की थी ?

आपको बता दें कि अमेरिका ने पूरी दुनिया के सामने 1903 में पहला विमान सभी के सामने रखा था लेकिन भारत के इतिहास पटल पर हम अगर एक नजर डालते हैं तो हमें पता चलता हैं कि हमारे यहाँ महाभारत काल से ही और उससे पूर्व रामायण काल से बड़े बड़े विमान प्रयोग में लाये जाते थे I

 

न केवल हमारे पूर्वजों ने विमान बनाये थे इसके अलावा उन्होंने तीनों लोकों में रहने के लिए घर और नगर तक की भी स्थापना की थी, आपको हम याद दिलाते हैं कि हर हिन्दू को एक बात ज्ञात ही हैं कि भगवान् शंकर का एक नाम त्रिपुरारी भी हैं, भगवान भोलेनाथ का नाम त्रिपुरारी क्यों पड़ा, सव्ही जानते हैं कि त्रिपुर नाम राक्षस भाइयों का वध करने के कारण भगवान् भोलेनाथ का नाम त्रिपुरारी पड़ा I

हम आपको बता दें कि यह जो त्रिपुरा भाई हैं इन भाइयों ने अन्तरिक्ष में ऐसे खूबसूरत और अजेय नगरों का निर्माण कर लिया था जिन्हें जीत पाना संभव ही नहीं था अंत में देवताओं के विशेष आग्रह पर कैलाशपति भगवान् भोले नाथ इन असुरों का वध किया और उन तीनों नगरों को भी नष्ट कर दिया था I

हमारे शास्त्रों और पुराणों में पहले ही इस बात का वर्णन किया जा चुका हैं कि हमारे देवी, देवता, यक्ष, गन्धर्व आदि विमानों के द्वारा ही एक स्थान से दूसरे स्थानों पर आया – जाया करते थे I हिन्दुओं के पवित्रग्रन्थ श्री रामचरितमानस में भी इन विमानों का वर्णन किया गया हैं – जैसे –

सतीं बिलोके ब्योम बिमाना। जात चले सुंदर बिधि नाना॥

आपको ज्ञात ही होगा कि रामचरित मानस में केवल एक ही बार विमानों की गाथा का वर्णन नहीं किया गया हैं अपितु, गोस्वामी तुलसीदास जी ने कई बार विमानों के बारे में श्रीरामचरितमानस मानस में वर्णन किया हैं, उन्होंने पहले कुबेर के द्वारा पुष्पक विमान फिर कुबेर से रावण के द्वारा पुष्पक का छीन लेना और रावण को मारने के बाद जब भगवान् श्री राम के अयोध्या आगमन की कथा को लिखते हुए भी उन्होंने पुष्पक विमान के बारे में बतलाया हैं –

नगर निकट प्रभु प्रेरेउ उतरेउ भूमि बिमान I

इसके अलावा जब रावण को पराजित कर माता सीता के और भाई लक्ष्मण जी के साथ भगवान् श्री राम अयोध्या के लिए चले तब भी उन्होंने इसी विमान का प्रयोग किया था –

अतिसय प्रीति देखि रघुराई। लीन्हे सकल बिमान चढ़ाई॥
मन महुँ बिप्र चरन सिरु नायो। उत्तर दिसिहि बिमान चलायो॥1

री रघुनाथजी ने उनका अतिशय प्रेम देखकर सबको विमान पर चढ़ा लिया। तदनन्तर मन ही मन विप्रचरणों में सिर नवाकर उत्तर दिशा की ओर विमान चलाया॥1॥

चलत बिमान कोलाहल होई। जय रघुबीर कहइ सबु कोई॥
सिंहासन अति उच्च मनोहर। श्री समेत प्रभु बैठे ता पर॥2

विमान के चलते समय बड़ा शोर हो रहा है। सब कोई श्री रघुवीर की जय कह रहे हैं। विमान में एक अत्यंत ऊँचा मनोहर सिंहासन है। उस पर सीताजी सहित प्रभु श्री रामचंद्रजी विराजमान हो गए॥2॥

आपको यहाँ पर यह भी बताना उचित ही होगा कि आज हमारे सामने जो भी विमान हैं उनके उतरने के ज्यादातर स्थान निश्चित होते हैं या फिर किये जाते हैं लेकिन हमारे रामायण या फिर महाभारत कालीन जो भी विमान थे उन्हें कहीं भी उतारा जा सकता था और फिर उन्हें वहीँ से उड़ाया भी जा सकता हैं था I जैसे हम आपकी जानकारी के लिए इस बात का वर्णन भी यहाँ पर कर देते हैं कि जब भगवान् श्री राम लंका से रावण की विजय के बाद चले थे, तब उन्होंने अलग-अलग ऋषि और मुनियों के आश्रम में रुक-रुक कर उनकी पूजा और आशीर्वाद लेते हुए अयोध्या गए थे I उदहारण –

राजत रामु सहित भामिनी। मेरु सृंग जनु घन दामिनी॥
रुचिर बिमानु चलेउ अति आतुर। कीन्ही सुमन बृष्टि हरषे सुर॥3

भावार्थ:-पत्नी सहित श्री रामजी ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो सुमेरु के शिखर पर बिजली सहित श्याम मेघ हो। सुंदर विमान बड़ी शीघ्रता से चला। देवता हर्षित हुए और उन्होंने फूलों की वर्षा की॥3॥

तुरत बिमान तहाँ चलि आवा। दंडक बन जहँ परम सुहावा॥
कुंभजादि मुनिनायक नाना। गए रामु सब कें अस्थाना॥1

भावार्थ:-विमान शीघ्र ही वहाँ चला आया, जहाँ परम सुंदर दण्डकवन था और अगस्त्य आदि बहुत से मुनिराज रहते थे। श्री रामजी इन सबके स्थानों में गए॥1॥

सकल रिषिन्ह सन पाइ असीसा। चित्रकूट आए जगदीसा॥
तहँ करि मुनिन्ह केर संतोषा। चला बिमानु तहाँ ते चोखा॥2

भावार्थ:-संपूर्ण ऋषियों से आशीर्वाद पाकर जगदीश्वर श्री रामजी चित्रकूट आए। वहाँ मुनियों को संतुष्ट किया। (फिर) विमान वहाँ से आगे तेजी के साथ चला॥2॥

सुरसरि नाघि जान तब आयो। उतरेउ तट प्रभु आयसु पायो॥
तब सीताँ पूजी सुरसरी। बहु प्रकार पुनि चरनन्हि परी॥4

भावार्थ:-इतने में ही विमान गंगाजी को लाँघकर (इस पार) आ गया और प्रभु की आज्ञा पाकर वह किनारे पर उतरा। तब सीताजी बहुत प्रकार से गंगाजी की पूजा करके फिर उनके चरणों पर गिरीं॥4॥

 

भगवान् श्री राम ने वैमानिकी शास्त्रों के रचयिता श्री भारद्वाज मुनि से पुनः मिलने के लिए भी गए I

तुरत पवनसुत गवनत भयऊ। तब प्रभु भरद्वाज पहिं गयऊ॥
नाना बिधि मुनि पूजा कीन्ही। अस्तुति करि पुनि आसिष दीन्ही॥2

 

भावार्थ:-पवनपुत्र हनुमान्‌जी तुरंत ही चल दिए। तब प्रभु भरद्वाजजी के पास गए। मुनि ने (इष्ट बुद्धि से) उनकी अनेकों प्रकार से पूजा की और स्तुति की और फिर (लीला की दृष्टि से) आशीर्वाद दिया॥2॥

* मुनि पद बंदि जुगल कर जोरी। चढ़ि बिमान प्रभु चले बहोरी॥
इहाँ निषाद सुना प्रभु आए। नाव नाव कहँ लोग बोलाए॥3

भावार्थ:-दोनों हाथ जोड़कर तथा मुनि के चरणों की वंदना करके प्रभु विमान पर चढ़कर फिर (आगे) चले। यहाँ जब निषादराज ने सुना कि प्रभु आ गए, तब उसने ‘नाव कहाँ है? नाव कहाँ है?’ पुकारते हुए लोगों को बुलाया॥3॥

 

आज के ज्यादातर तार्किक लोग जब इन्हें पढ़ते हैं तो कहते हैं कि मानव मात्र के मनोरंजन के लिए लिखी गयी पुस्तकें हैं और कुछ भी नहीं, क्योंकि हिन्दुओं के आराध्य भगवान् श्री राम या फिर भगवान् श्री कृष्ण के युग के प्रमाण ऐसे नहीं मिलते जो इस बात को सिद्ध कर सके कि उस युग में हिन्दुस्तानी लोगों के पास ऐसा कोई ज्ञान था जिसके प्रयोग से वह विमान बना सकते थे, लेकिन कहते हैं कि इतिहास हमेशा अपने निशाँ छोड़ जाता हैं और उसी क्रम में सौभाग्य से हमें यह किताब प्राप्त हुई, जिसने न केवल इस बात को साबित किया कि यह केवल और केवल कपोल कल्पनाएं नहीं अपितु एक ध्रुव सत्य हैं जिसे झुठलाया नहीं जा सकता हैं I

जिस एक किताब ने यह भी साबित किया कि हिन्दुस्तानियों के पास न केवल विमान बनाने की जानकारी ही थी उसके अलावा उस समय में वह बहुत ही विकसित ज्ञान था जहाँ आज भी हमारा विज्ञान नहीं पहुँच सका हैं I

 

शेष आगे के खण्डों में हम इसे प्रकशित करने का प्रयास करेंगे –

आप इसे अगर और पढना चाहते हैं तो हमें मेल कर सकते हैं या फिर फ़ोन भी कर सकते हैं

हमारी ईमेल आईडी हैं – aapkibaat@akhandbharatnews.com and for phone you can Dail – 9871030408

 

आपके विचारों की हम कद्र करते हैं I आप हमें सहयोग भी कर सकते हैं I आपका कोई भी सहयोग हमारे लिए अत्यंत ही महत्त्व पूर्ण होगा I

 

धन्यवाद I

 

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY

2 × two =