विधान सभा चुनाव में हार-जीत का आंकलन करना आसान नहीं

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प्रतीकात्मक
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जालौन : उरई-जालौन विधान सभा चुनाव में हार-जीत का आंकलन करना किसी भी राजनैतिक पंडित के लिए आसान नहीं है। चुनाव पार्टी के आधार पर नहीं बल्कि जनता के बीच अपनी पैठ बनाने तथा जातीय समीकरण और अच्छी छवि वाले प्रत्याशी को विजय श्री प्राप्त हो सकती है। यहां अभी तक किसी दल के पक्ष और विपक्ष जैसा कोई माहौल नहीं दिखाई पड़ रहा है।

विधान सभा चुनाव में प्रत्याशी को अपनी सक्रियता तथा जनता से अपनी पैठ के साथ-साथ जातीय समीकरण और अच्छी छवि बनाने की आवश्यकता है। अभी जो नजर आ रहा है उस आधार पर कहा जा सकता है कि चुनाव पार्टी पर नहीं बल्कि जनता प्रत्याशी को देखकर और उसके आचार विचार तथा व्यवहार का आंकलन कर अपना मत देना कर रही है। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में उरई जालौन विधानसभा में सपा प्रत्याशी दयाशंकर वर्मा ने जीत हासिल की थी। तो वहीं, कालपी विधानसभा में कांग्रेस प्रत्याशी उमाकांती ने अपना परचम फहराया था। दोनों बातें यह स्पष्ट करती हैं कि जनता पार्टी के विकास के वादों के अलावा उनके प्रलोभनों को दरकिनार कर उसी के साथ खड़ी होती है जो जनता के बीच जाकर उनकी समस्याओं को सुनता है। लेकिन इतना ही प्रत्याशी के लिए काफी नहीं होता है उसके जातीय समीकरण का भी आकलन किया जाता है। राजनैतिक विश्लेषज्ञ मानते हैं कि इस बार का चुनाव खासतौर पर उम्मीदवार आधारित चुनाव है। क्योंकि अभी तक न तो किसी भी दल के पक्ष में कोई माहौल है और न ही विपक्ष में। इस दशा में प्रत्याशी की छवि उसके चुनाव में जीत के लिए महत्वपूर्ण हो गई है। क्योंकि लोगों में अखिलेश सरकार के प्रति एंटी इंकम्बेसी है और न ही नोटबंदी से भाजपा के खिलाफ असंतोष है। लगभग यही हाल बसपा का भी है। इसलिए कहा जा सकता है कि इस बार का चुनाव पूरी तरह उम्मीदवार पर ही आधारित होगा।

रिपोर्ट – अनुराग श्रीवास्तव

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