मस्ज़िद की बुर्ज पर लगा हुआ है त्रिसुल, और भीतर बनें हैं नवगृह

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दुनिया में आपने कभी किसी मस्ज़िद की बुर्ज पर भगवान शंकर का त्रिसूल लगा हुआ नहीं देखा होगा, लेकिन आज हम आपके सामने जिस मस्ज़िद को दिखा रहे हैं इस मस्ज़िद के ऊपर यानि कि इसके बुर्ज पर जहाँ मस्ज़िद में हमेशा चाँद लगा रहता हैं उस स्थान पर चाँद की जगह पर भगवान् शंकर का त्रिसूल आज भी लगा हुआ हैं I

धार्मिक एकता और परस्पर स्नेह का प्रतीक मान सकते हैं हम इस मस्ज़िद को –

राजधानी दिल्ली के पुराने किले के एक छोर पर स्थित यह मश्जिद 1541 ई. से लगातार भारत के बदलते हुए माहौल का गवाह रहा हैं I कहा जाता हैं कि मश्जिद का निर्माण 1541 ई. में शेरशाह सूरी के द्वारा करवाया गया था I तब से लेकर आज तक इस मंदिर ने बड़े से बड़े सूरमाओं को अपने इर्द-गिर्द आते जाते हुए भ्रमण करते हुए देखा I बहुत से राजपरिवार दिल्ली के इस पुराने किले में आये और चले गए लेकिन यह मश्जिद आज भी अपने उसी स्थान पर खड़ा हुआ हैं I

तस्वीरों में देखें मंदिर के सभी भागों के खूबसूरत द्रश्य –

दिल्ली के पुराने किले के कोने में स्थित मस्जिद का बुर्ज और लाल घेरे में आप देख सकते हैं बुर्ज़ पर स्थित त्रिसूल (ज़ूम करके आप देख भी सकते हैं इसे )
दिल्ली के पुराने किले के कोने में स्थित मस्जिद का बुर्ज और लाल घेरे में आप देख सकते हैं बुर्ज़ पर स्थित त्रिसूल (ज़ूम करके आप देख भी सकते हैं इसे )
मस्जिद के उपरी भाग का दूसरा हिस्सा यहाँ से भी आप त्रिसूल को साफ़ देख सकते हैं
मस्जिद के भीतर का एक द्रश्य जहाँ पर कोनों पर बने हुए हिन्दू धर्म में प्रचलित नव ग्रहों का एक द्रश्य
मस्जिद के भीतर का एक द्रश्य जहाँ पर कोनों पर बने हुए हिन्दू धर्म में प्रचलित नव ग्रहों का एक द्रश्य, यह प्रायः केवल और केवल हिन्दुओं के मंदिरों और पूजा घरों में ही दिखाई पड़ते हैं
मस्जिद के दूसरे कोने पर किसी मंदिर का उल्टा द्रश्य, आप इसे साफ़ देख सकते हैं
मस्जिद के बाहर बिलकुल सामने आने पर बना हुआ शिवलिंग के जैसा खांचा या फिर हो सकता हैं कि यहाँ झरना भी रहा हो
मस्जिद के बाहर का द्रश्य इसे देखकर भी आप को इसकी विशेषता का आभास हो रहा होगा , क्योंकि मस्जिद में अक्सर ऐसे गेट नहीं होते हैं, आप मैच कर सकते हैं -
मस्जिद के बाहर का द्रश्य इसे देखकर भी आप को इसकी विशेषता का आभास हो रहा होगा , क्योंकि मस्जिद में अक्सर ऐसे गेट नहीं होते हैं, आप मैच कर सकते हैं -

आजकल के बदलते माहौल में जहाँ छोटी-छोटी सी बातों में दंगे हो जाते हैं अनेकों-अनेक निर्दोष लोग काल के गाल में समां जातें हैं ऐसे में मुझे यह लगता हैं कि ऐसे लोगों के लिए यह पवित्र मस्ज़िद एकता का सूत्रधार बन सकती हैं I क्योंकि इस मस्ज़िद के बुर्ज पर लगा हुआ यह त्रिसूल और इसको लगाने वाले दोनों के मानने वाले अलग हैं और आज आपस में कलह कर रहे हैं I लेकिन आज से बहुत से साल पहले एक अफगान ने एकता, प्रेम और सौहार्द की ऐसी मिसाल शायद इसलिए बनवाई थी कि आने वाली पीढियां इसे देखकर एकता का पाठ पढ़ सकें और आपस में द्वेष की भावना के साथ रहने की बजाय प्रेम से रह सकें I

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