ठुमक चलत रामचंद्र बाजत पैजनियां

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बबुरी (चन्दौली ब्यूरो)- प्रभु श्री राम जी के बाल स्वरूप का दर्शन करने के लिए स्वयं भूत भावन भगवान शंकर एक ज्योतिषी का वेश बनाकर अयोध्या आए तो उनके साथ काग भुसुंडी जी भी साथ हो लिए। काफी प्रयास करने के बाद जब भोलेनाथ राजमहल में पहुंचे तो पहले तो माता ने कौशल्या ने राजकुमार को ज्योतिष को दिखाने से ही मना कर दिया लेकिन बाद में दिखाया और ज्योतिष के चरणों में राघव का सर पटक दिया जिससे शिवजी विचलित हो गए उन्होंने अंतर में सोचा कि जिनके चरणों से निकली गंगा को मैंने सिर पर धारण किया है उनका सिर मेरे चरणों में यही सोच भगवान शिव विचलित हो गये तब माता ने कहा कि महाराज बच्चों को संस्कार तो बचपन से ही डालना चाहिए वही राघव ने इशारों से शिव जी से कहा कि आज आप मुझे पैर छूने दो नहीं तो मैं आपका भेद खोल दूंगा और आप पकडे जाएंगे जिस कारण भोले नाथ चुप रह गए।

ज्योतिश बने भूत भावन भगवान शिव के बार बार मांगने पर भी जब माता ने बालक को गोंद में देने से मना कर दिया तो उन्होंने मनहि मन राघव से प्रार्थना की की आप मेंरे गोद में किसी भी प्रकार आये नही तो मेरा आना निष्फल होगा प्रभु की विनती सुन राघव रोने लगे और तब तक रोते रहे जब तक कि वे ज्योतिष की गोंद में नहीं चले गए। फिर ज्योतिष बने शंकर ने प्रभु का भूत भविष्य बताना प्रारम्भ किया और जब उनके वनगमन कि बात बताने वाले थे तबतक राघव में उनकी दाढ़ी खिंच रुकने का इशारा किया।

राजकुमारों के नामकरण संस्कार कराने हेतु गुरूदेव वशिष्ठ को महाराज ने बुलावा भेजा तब गुरुदेव ने कौशल्या के लाल को राम  कैकेयी के लाल को भरत व माता सुमित्रा के सूत द्वय का लक्षमण व शत्रुघ्न नाम रखा।राम कथा के चतुर्थ दिवस में निकुंज श्रीधाम अयोध्या से पधारे प्रवक्ता कथा भास्कर आचार्य रत्नेश जी महाराज ने लोगों को रामकथा का रसपान कराया।

एक बार माता कौशल्या ने राघव को नहला कर व श्रृंगार कर पालने में सुलाया और स्वयं श्री हरि को भोग लगाने चली गई तो देखा कि राघव भोग में रखे लड्डू को खा रहे हैं जिसे देख माता घबरा गई और वापस पालने में आएंगे तो वहां भी देखा कि राघव सो रहे हैं अपनी माता को इस प्रकार भ्रमित देख राघव ने अपना विराट समूह माता को दिखाया जिससे उनका भ्रम दूर हुआ।

एक बार अपने बाल सखाओं के साथ जब राम खेल रहे थे तो उनके पिता ने उन्हें भोजन के लिए बुलाया लेकिन वह आने से इंकार कर दिया रामजी जब अपने आंगन में चलते थे तो उनके सौंदर्य का वर्णन तुलसीदास ने बहुत ही मार्मिक ढंग से किया है।
राजकुमार शिक्षा ग्रहण करने हेतु गुरु वशिष्ठ के आश्रम में जहां पर अल्पकाल में ही सभी विद्याओं प्राप्त किया तत्पश्चात वापस अपने गृह को आए अभी वापस आए हुए मैं कुछ ही समय बीता था कि विश्वामित्र महामुनि महाराज दशरथ के पास आते हैं और अनुज समेत रघुनाथ को मांगते हैं इतना सुनते ही महाराज दशरथ चेतना शून्य हो जाते हैं और जब उनकी चेतना वापस आती है तो वह कहते हैं कि ” राघव को मैं न दूंगा मुनि नाथ मरते मरते” तब वशिष्ठ जी ने बहुत प्रकार से राजा को समझाया तब जाकर महाराज दशरथ हमें राम को लखन समेत विश्वामित्र जी के साथ जाने की अनुमति प्रदान की आश्रम के रास्ते में सर्वप्रथम राम ने तारका का वध किया उसके बाद मुनिवर के यज्ञ की रक्षा की और सीता स्वयंवर देखने जाते समय रास्ते में अहिल्या का उद्धार भी किया।

कथा में सारनाथ तिवारी शिवनारायण जायसवाल  चंद्र प्रकाश गांधी  राजेंद्र सिंह  मनोज सेठ  हेमंत सिंह  दिनेश जायसवाल  महेंद्र सेठ  पंकज तिवारी  दिलीप तिवारी  रामाश्रय तिवारी सहित सैकडों श्रद्धालुओं ने संगीतमय भगवत कथा का  रसपान किया । मंच का संचालन एडवोकेट ओम प्रकाश गुप्ता ने किया ।

रिपोर्ट–रोहित वर्मा
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