भाजपा से बेगाने हो रहे वरुण गाँधी

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सुल्तानपुर । भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव व उ. प्र. के सुलतानपुर जिले से सांसद वरूण गांधी भाजपा में अब बेगाने हो गये है। यू0पी0 में वरूण गांधी को भाजपा का चेहरा बनाने की मांग को लेकर उनके समर्थकों ने कई जिलो में सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक खूब अभियान चलाये लेकिन सत्ता एवं संगठन दोनों में हांसिये पर आये वरूण गांधी को भाजपा किनारे करने पर लगी है।

शायद जो उम्मीदें वरूण गांधी से भाजपा को थी वह उस पर खरे नही उतरे। यही वजह हो सकती है कि सत्ता और संगठन के साथ पार्टी से जुड़े अन्य मामलों में भी इनकी पूछ नहीं हो रही है। पार्टी में हो रही उनकी अनदेखी का अंदाजा इसी से लगा सकते है कि उनके संसदीय क्षेत्र सुलतानपुर में एक भी टिकट पार्टी ने उनके कहने पर नही दिया। दूसरी तरफ पार्टी के स्टार प्रचारकों की घोषित पहली सूची में उन्हें जगह नही मिली। दूसरी सूची में उनका नाम आया जरूर था, लेकिन अंतिम चरण के चुनाव तक स्टार प्रचारक सूची से उनका नाम निकाल दिया गया। पहले संगठन फिर सत्ता में भागीदारी मिलने से वंचित रहे वरूण गांधी की नाराजगी किसी न किसी बहाने समय समय पर उजागर होती रही। अभी हाल ही में दलित छात्र रोहित बेमुला एवं उद्योगपति विजय माल्या के बहाने एक बार फिर उनकी नाराजगी उजागर हुई। दिल्ली का रास्ता यूपी से ही होकर जाता है यह चुनाव भाजपा के लिए कितना महत्वपूर्ण है नेतृत्व बाखूबी समझ रहा है, बड़े-बड़े नेता प्रचार में लगे हैं तो वहीं वरूण गांधी अपने संसदीय क्षेत्र में अभी तक नही आये। भाजपा और वरूण के रिश्ते में आई दरार के पीछे की मुख्य वजह जो भी हो लेकिन एक बात साफ दिख रही है कि पार्टी को वरूण गांधी से राजनीतिक फायदे की जो उम्मीदें थी शायद पूरी होने की दूर तक संभावनाएं नही दिख रही हैं। भाजपा और काग्रेंस दोनों दल का राष्ट्रीय राजनीति में दखल है, दोनो दल एक दूसरे के विपरीत विचार धारा के पोषक हैं दोनों की नीतियां सिद्धान्तों विचारों में भी अन्तर है बावजूद इसके भाजपा में रहकर वरूण गांधी ने कांग्रेस की कभी खुलकर मुखाफलत नही की। कांग्रेस में गांधी खानदान की बड़ी बहू सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी तो दूसरी तरफ छोटी बहू मेनका गांधी, वरूण गांधी भाजपा में सक्रिस भूमिका में है गांधी खानदान की इन बहुओं को कार्यक्षेत्र भी उत्तर प्रदेष है सोनिया गांधी रायबरेली, राहुल गांधी अमेठी व वरूण गांधी सुलतानपुर से सांसद हैं ये तीनों जिलें एक दूसरे से सटे हुए हैं। वही वरूण की मां मेनका गांधी यू. पी. की ही पीलीभीत जिले से सांसद है गांधी खानदान के इन दोनो परिवारो के बीच रिश्तों में कड़वाहट जग जाहिर है इन सबके बाद भी शायद ही कभी ऐसा मौका आया हो जब गांधी परिवार के इन दो विपरीत ध्रुवों के मध्य सियासी वाक्युद्ध छिड़ा हो। दलों में दूरिया दिलों में फासलें जरूर है लेकिन इनके बीच जो मर्यादा है उसे लांघने की परहेज दोनों तरफ से होती रही। जबकि समय पर भाजपा का शीर्ष नेतृत्व कांग्रेस को निषाने पर लेकर घेरने की कोषिष में लगा रहता है। कभी सुलतानपुर जिले का हिस्सा रही अमेठी को कांग्रेस का गढ़ माना जाता है। इस सीट से गांधी परिवार का कोई न कोई सदस्य सांसद रहा है। इस समय राहुल गांधी यहां से सांसद हैं। हालांकि उनका असर सुलतानपुर जिले में कभी नही दिखा।

सुलतानपुर को महफूज ठिकाना मान वरूण गांधी ने जब सुलतानपुर से चुनाव लड़ने का मन बनाया तो अपनी टीम द्वारा जन भावनाओं की टोह लेने के बाद सुलतानपुर आये। मई 2013 में शहर में एक बड़ी सभा हुई जिसमें वरूण गांधी ने अपने पिता स्व0 संजय गांधी की कर्मभूमि बताकर इस जिले से भावनात्मक रिष्तें की दुहाई देते हुए सेवा का मौका मांगा था। उस समय ही वरूण के भाषण से लग गया था कि वह अब एक अलग ढंग से राजनीति करना चाहते हैं। इसी सभा में उन्होंने पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी, प्रदेष अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी की मौजूदगी में पूर्वांचल के कई जिलो का नाम लेकर कहा था कि यहां से राजनीतिक परिवर्तन की बयार चल रही है लेकिन अमेठी रायबरेली का नाम नही लिया था। सपा, बसपा पर कटाक्ष किये लेकिन कांग्रेस की चर्चा तक नही की, अखिलेष और मायावती को भी कोसा लेकिन ताई सोनिया गांधी व भाई राहुल गांधी का नाम लेने से परहेज किया यही नही इंसानियत और विकास के मुद्दे तक ही अपने भाषण को केन्द्रित रखा। लोकसभा चुनाव दौरान व चुनाव बाद वरूण गांधी ने सभाओं से एक अलग संदेष देने की कोषिष की। वरूण गांधी में आये बदलाव की यह बयार धीरे-धीरे बढ़ चली तो संघ व भाजपा के बड़े नेताओं की बेचैनी भी बढ़ी। संघ व भाजपा को वरूण से शायद यह उम्मीद थी की पार्टी के कांग्रेस मुक्त भारत अभियान में कांग्रेस के खिलाफ हथियार बनेगें, मुसलमानों के खिलाफ मुखर होंगे लेकिन भाजपा को वरूण से निराषा ही हाथ लगी। वरूण ने अपने राजनीतिक तौर-तरीके में काफी बदलाव किया है। कट्टर हिन्दुत्व छवि के चलते कभी फायर ब्राण्ड नेता के रूप में पहचान बनाने वाले वरूण अब अपने भाषण की शैली बदल रहे हैं वह अब अन्य राजनीतिज्ञो से अलग दिखना चाहते हैं। दूसरे नेताओं से इतर कुछ अलग दिखने, करने की कोशिश भी कर रहे हैं। उनके भाषण का एजेन्डा अब पहले की तरह कट्टर हिन्दुत्व का नही बल्कि गांव गरीब का सर्वांगीण उत्थान इन्सानियत और विकास मुद्दा है। समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति के लिए कुछ करने का उनका सपना है उनके इस सपने की झलक उनके कामों में भी दिखती है। चाहे अपना सारा वेतन गरीबों को दान करने की पहल हो या सांसद निधि से क्षेत्र के पैंतिस ऐेसे परिवारों को जिनके पास रहने को घर नही थे पक्के मकान बनवा कर सौपें। आगे भी मकान बनाकर देने की योजना है।

वरूण की बेबाक बयानी, गांधी परिवार से नाता, पार्टी गाइड लाइन से इतर कार्य आदि ऐसे कारण है जो भाजपा में उनकी राह का रोड़ा है। शायद यही वजह रही कि अर्से से भाजपा में रहने के बाद भी वरूण गांधी व उनकी मां मेनका गांधी को शीर्ष नेतृत्व स्वीकार नही कर पाया। दरअसल यू0पी0 में अपना जनाधार खो चुकी कांग्रेस जिस तरह से अपने वजूद की संभावनाए तलाष रही है उससे निकट भविष्य मेें राहुल प्रियंका की जोड़ी यू0पी0 की सियासी पिच पर उतरी तो वरूण भाजपा के लिए कितना कारगर होगें पार्टी इसे लेकर सतर्ग है वहीं वरूण गांधी अकेले ऐसे नेता रहे जिनके क्षेत्र में गत् लोकसभा चुनाव में भाजपा के किसी नेता की चुनावी सभा नही हुई। कहा जा रहा था कि वरूण ने किसी नेता के कार्यक्रम सुलतानपुर लगाने के लिए मांगा ही नही। खुद ही प्रत्याषी खुद ही प्रचारक रहे यही नही नरेन्द्र मोदी जब अमेठी से चुनाव लड़ रही स्मृति ईरानी के लिए जनसभा करने आये थे तो उनका प्लेन सुलतानपुर हवाई पट्टी पर ही उतरा था। सुलतानपुर आकर ही वे अमेठी गये। लेकिन सुलतानपुर में उनकी सभा नही हुई यही नही जिले के सभी नेता मोदी की अगवानी करने हवाई पट्टी पहुंचे थे तब भी वरूण गांधी ने मोदी की आगवानी से परहेज किया था। यहां से सांसद बनने के बाद संगठन से इतर वरूण ने अपना कार्यालय खोला इस कार्यालय का प्रभार उनके जनसम्पर्क अधिकारी दयाराम अटल के जिम्मे है जहां से उनके संसदीय क्षेत्र के लोगों का सीधा जुड़ाव है।

रिपोर्प–संतोष कुमार यादव

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