मन्थराओं से सतर्क रहने की जरुरत : हनुमान दास

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इलिया/चंदौली (ब्यूरो) : ज्ञान रुपी भगवान राम और भक्ति स्वरुपा माता सीता का संबंध जुड़ने के वक्त जो वैवाहिक मंडप मिथिला में बना था ।उस मंडप के चारों ओर जो खंभे थे ।वह मानो चारों वेद थे ।चारों वेद ही राम भरत लक्ष्मण और शत्रुघ्न अर्थात चारों भाई थे।

उक्त उद्गार प्रेम रस मानस महायज्ञ सेवा समिति द्वारा आयोजित सरैया मे आयोजित संगीतमय श्रीराम कथा के आठवे दिन मानस वाचक हनुमानदास जी ने कही ।उन्होंने कहा कि ज्ञान और भक्ति का विवाह संपन्न होने के बाद जब भक्ति स्वरूपा माता सीता का मिथिला से विदाई होने लगा तो कोई भी ऐसा नर नारी नहीं था जो कि रो न दिया हो यहां तक कि मिथिला राज्य के वृक्ष पशु पक्षी भी रो दिए ।विदाई के करूंण दृश्य का वर्णन सुनाते हुए कथा वाचिका के आंसू छलक पड़े तो कथा सुनने वाले श्रोता भी करुणा के भाव में शांत हो गए।

उन्होंने महिलाओं को आगाह करते हुए कहा कि जिस तरह अयोध्या में मंथरा मौजूद थी उसी तरह हर गांव व घर में भी मंथरा मौजूद हैं ऐसी मन्थराओ से सतर्क रहने की जरुरत है। जिस तरह से कैची कपड़े को काट के अलग करने का काम करती है वही सबसे कम कीमत की सूई कटे कपड़े को जोड़ने का काम करती है। उसी तरह आज के लोग भी सुई के भूमिका में अपना कार्य करेंगे तो उनके जीवन में सुख की प्राप्ति होगी। कथा में राम किंकर राय सुभाष गिरी डॉक्टर गीता शुक्ला, विजयानंद द्विवेदी पूनम पांडेय, प्रभावती देवी, ने माल्यार्पण कर कथा को प्रारंभ कराया।

रिपोर्ट – मिथिलेश ठाकुर

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