अस्तित्व खोते जा रहे हैं कुएं व तालाब

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बछरावाँ/रायबरेली (ब्यूरो)- बछरावाँ विधान सभा क्षेत्र में तालाबों में पानी नही है जिसके कारण पशु-पक्षी परेशान हो रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि नहरों में धूल उड़ रही है, जल स्तर गिर रहा है, रखरखाव के कारण पूर्वजों द्वारा निर्मित कुयें अपना अस्तित्व खो रहे हैं। कुओं की लम्बें समय से सफाई नही हुयी है। ज्यादातर ग्रामीण स्तर के लोग पेयजल के लिये हैण्डपाइप पर ही निर्भर हैं। तालाबों पर गीली मिट्टी निकालकर देशी फ्रिज बनाने वाले इंजीनियरों का आधुनिक युग में बुरा हाल है उनके परिश्रम की पूँजी भी खदान प्रतिबन्धित होने के कारण नही निकल पा रही है। गाँव के लोग प्यास बुझाने के लिये सुराही का सहारा लेते थे जिनसे दोनों परिवारों का कार्य चलता था आज आधुनिक युग में गाँवों में देशी फ्रिज का सहारा इलेक्ट्रानिक फ्रिज ले रहे हैं।

दुर्गापुर निवासी सलीम ने बताया कि मेरी तीन पीढ़ियाँ मिट्टी से निर्मित बर्तन, मूर्तियाँ, बच्चों के खिलौने एवं सुराही, घड़े बनाकर जीविका चलायी जाती थी त्यौहारों में भी गाँवों के लोग भरपूर सहयोग करते थे। जिससे साल भर के खर्च आसानी से चल जाते थे। नयी पीढ़ी का मोह इन बर्तनों के प्रति कम होता जा रहा है बच्चें भी इस धन्धे से मुँह मोड़ रहे हैं। अगर शासन द्वारा इस व्यवसाय आर्थिक सहयोग प्रदान कर दिया जाये तो कारीगर अपनी प्रतिभा के माध्यम से ऐसी मिट्टी के देशी फ्रिज बनाकर आर्थिक तौर पर मजबूत होकर विकास की अगली पीढ़ी में खड़े हो सकते हैं।

इस कला को बचाने के लिये ग्रामीण अंचल के समाजिक संगठनों का सहयोग अवश्यक है। जहाँ व्यापारी अपने प्रतिष्ठानों एवं घरेलू महिलायें अपने घरों में दीपावली एवं धन तेरस जैसे त्यौहारों में मिट्टी द्वारा निर्मित गणेश-लक्ष्मी एवं कुबेर की पूजा करके इस परम्परा का निर्वाह करते हुये कुम्हार परिवारों को रोजगार देते हैं एक दूसरे के निकट आने का मौका भी ये त्यौहार प्रदान करते हैं।

जहाँ प्लास्टिक से निर्मित बर्तन तरह-तरह की बिमारियां परोसते हैं वहीं दैनिक उपयोग मंे होटलों से लेकर शादी व्याह के मण्डप तक मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग आसानी से किया जा सकता है। मांगलिक कार्यों मंे भी ये बर्तन काफी शुभ माने जाते हैं।

रिपोर्ट- राजेश यादव

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