15 अगस्त के दिन आज़ादी स्वयं इस देश से क्या कहना चाहती है? पढ़ें भारत माँ का दर्द …

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15th aug

बेबस हूँ मै बिखरी हूँ, उलझी हूँ, सत्ता के जालो में !
एक दिवस को छोड़ बरस भर, बंद रही हूँ तालों में !!

बस केवल पंद्रह अगस्त को मुस्काने की आदी हूँ !
लालकिले से चीख रही मैं भारत की आज़ादी हूँ !!

जन्म हुआ सन सैतालिस में,बचपन मेरा बाँट दिया !
मेरे ही अपनों ने मेरा दायाँ बाजू काट दिया !!

जब मेरे पोषण के दिन थे तब मुझको कंगाल किया !
मस्तक पर तलवार चला दी,और अलग बंगाल किया !!

मुझको जीवनदान दिया था लाल बहादुर नाहर ने !
वर्ना मुझको मार दिया था जिन्ना और जवाहर ने !!

मैंने अपना यौवन काटा था काँटों की सेजों पर !
और बहुत नीलाम हुयी हूँ ताशकंद की मेजों पर !!

नरम सुपाड़ी बनी रही मैं,कटती रही सरौतों से !
मेरी अस्मत बहुत लुटी है उन शिमला समझौतों से !!

मुझको सौ सौ बार डसा है,कायर दहशतगर्दी ने !
सदा झुकायीं मेरी नज़रे,दिल्ली की नामर्दी ने !!

मेरा नाता टूट चुका है,पायल कंगन रोली से !
छलनी पड़ा हुआ है सीना नक्सलियों की गोली से !!

तीन रंग की मेरी चूनर रोज़ जलायी जाती है !
मुझको नंगा करके मुझमे आग लगाई जाती है !!

मेरी चमड़ी तक बेची है मेरे राजदुलारों ने !
मुझको ही अँधा कर डाला मेरे श्रवण कुमारों ने !!

उजड़ चुकी हूँ बिना रंग के फगवा जैसी दिखती हूँ !
भारत तो ज़िंदा है पर मैं विधवा जैसी दिखती हूँ !!

मेरे सारे ज़ख्मों पर ये नमक लगाने आये हैं !
लालकिले पर एक दिवस का जश्न मनाने आये हैं !!

बूढ़े बालों को ये काली चोटी देने आये हैं !
एक साल के बाद मुझे ये रोटी देने आये हैं !!

जो मुझसे हो लूट चुके वो पाई पाई कब दोगे !
मैं कब से बीमार पड़ी हूँ मुझे दवाई कब दोगे !!

सत्य न्याय ईमान धरम का पहले उचित प्रबंध करो !
तब तक ऐसे लालकिले का नाटक बिलकुल बंद करो !!

कवि गौरव चौहान

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