ॐ को आखिर क्यों माना जाता हैं सर्वशक्तिमान, वैज्ञानिक भी क्यों देते हैं इसके जप की सलाह

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ॐ (फोटो क्रेडिट-www.pinterest.com)
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हिंदू धर्म को मानने देवी-देवताओं में श्रधा रखने वाला हर एक इंशान ॐ के बारे में बहुत ही अच्छी तरह से जानता हैं I जो भी व्यक्ति उपरोक्त सभी बातों से सम्बन्ध रखता है या फिर हिन्दू धर्म पर कोई शोध करता है या शास्त्रों का अध्ययन करता हैं उसे ॐ के बारे में और उसकी महत्ता के बारे में न पता हो यह बिलकुल ही असंभव सा प्रतीत होता है I हिन्दू धर्म में प्रचलित धर्म शास्त्रों में  ॐ को प्रणब नाम भी दिया गया है I और इस एक अक्षर को ही साक्षात् ईश्वर भी बताया गया है I आइये आज हम जानते हैं कि क्या है ॐ का रहस्य –

ॐ के सम्बन्ध में सबसे अधिक जानकारी शिव पुराण में दी गयी है और शिवपुराण में ही ॐ को सबसे पहले “प्रणव” से संबोधित किया गया है और इसका अर्थ भी बताया गया है I शिवपुराण के अनुसार – प्र का अर्थ होता है प्रपंच और न का अर्थ होता है नहीं तथा व का अर्थ तुम लोगों के लिए बताया गया है I इस मूल अर्थ यह है कि प्रणव मंत्र सांसारिक जीवन में प्रपंच यानी कलह और दु:ख दूर कर जीवन के सबसे अहम लक्ष्य यानी मोक्ष तक पहुंचा देता है।

इस प्रणव का दूसरे शब्दों में अगर व्याख्या करें तो ‘प्र’ का अर्थ है प्रकृति रुपी संसार से पार लगाने वाली एक मात्र नव का अर्थ है नाव, यानिकी प्रकृति के द्वारा बनाये गए इस मोह रुपी संसार से पार लगाने वाली एक मात्र नैया को ही प्रणव अर्थात ॐ कहा जाता है I

जैसा कि हमने पढ़ा ही है कि जितने अधिक विद्वान होते है उतनी अधिक मान्यतायें प्रचलित होती है और उतने ही अलग-अलग अर्थ और व्याख्या किसी एक शब्द की प्रचलित होती है I ठीक इसी प्रकार से हमारे ऋषि-मुनियों की दृष्टि में  ‘प्र – प्रकर्षेण,’न – नयेत् और व: युष्मान् मोक्षम् इति वा प्रणव: बताया गया है। इसका सरल शब्दों में मतलब है हर भक्त को शक्ति देकर जनम-मरण के बंधन से मुक्त करने वाला होने से यह प्रणव है।

धार्मिक दृष्टि से परब्रह्म या महेश्वर स्वरूप भी नव या नया और पवित्र माना जाता  है। प्रणव मंत्र से उपासक नया ज्ञान और शिव स्वरूप पा लेता है। इसलिए भी यह प्रणव कहा गया है।

शिवपुराण की तरह अन्य हिन्दू धर्मशास्त्रों में भी ॐ यानि की प्रणव को अक्षर स्वरूप साक्षात् ईश्वर माना जाता है और मंत्र भी। इसलिए यह एकाक्षर ब्रह्म भी कहलाता है। धार्मिक मान्यताओं में प्रणव मंत्र में त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और शिव की सामूहिक शक्ति समाई है। यह गायत्री और वेद रूपी ज्ञान शक्ति का भी स्त्रोत माना गया है।

– आध्यात्मिक दर्शन है कि प्रणय यानी ऊं बोलने या ध्यान से शरीर, मन और विचारों पर शुभ प्रभाव होता है। वैज्ञानिक नजरिए से भी प्रणव मंत्र यानी ऊं बोलते वक्त पैदा हुई शब्द शक्ति और ऊर्जा के साथ शरीर के अंगों जैसे मुंह, नाक, गले और फेफड़ो से आने-जाने वाली शुद्ध वायु मानव शरीर के स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। अनेक हार्मोन और खून के दबाव को नियंत्रित करती है। इसके असर से मन-मस्तिष्क शांत रहने के साथ ही खून के भी स्वच्छ होने से दिल भी सेहतमंद रहता है। जिससे मानसिक एकाग्रता व कार्य क्षमता बढ़ती है। व्यक्ति मानसिक और दिल की बीमारियों से मुक्त रहता है।

 

 

 

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