जब खुद से मिलती हूं मैं . डाॅक्टर अमृता सिंह

 

लौट जाती हूं बचपन में, वो गिल्ली-डंडा वो छुपम-छूपाई और दौड़ते-दौड़ते गिर जाती हूं मैं
जब खुद से मिलती हूं मैं…………………………

आह क्या स्वादिष्ट गर्मा-गर्म खाना थाली में परोसकर लाई मां, चटखारे ले-ले के खाती हूं मैं
जब खुद से मिलती हूं मैं……………………………

वो बातों-बातों में सहेलियों, बहनों-भाईयांे से रूठना और गुस्से में भगा-भगा कर मारती हूं मैं
जब खुद से मिलती हूं मैं……………………………

आईने के सामने बैठकर खुद को निहारती हूं मैं, अपनी तारीफ खुद से करके थोडा शरमा जाती हूं मैं
जब खुद से मिलती हूं मैं…………………………

सपनों में जब आता है मेरे वो राजकुमार, परियों की कहानियों की तरह वो राजा और रानी बन जाती हूं मैं
जब खुद से मिलती हूं मैं………………………….

बिना किसी रोक के बिना किसी टोक के खुले आसमानों में ऊंचे पहाड़ों में बेखौफ निकल जाती हूं मैं
जब खुद से मिलती हूं मैं……………………………

हां ये सब खुली आंखों से नहीं बंद आंखों से करती हूं मैं
जी हां वो रात के छः घंण्टे मेरे और सिर्फ मेरे होते हैं
जब बिस्तर के नीचे अपनी सारी जिम्मेदारियों को उतार कर सोती हूं मैं
जब खुद से मिलती हूं मैं………………………………
जब खुद से मिलती हूं मैं……………………………….

डाॅक्टर अमृता सिंह

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