इंसाफ पर है अधिकार किसका

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Supreme Court

“आजकल अपराधियों के लिए सबसे अधिक सुरक्षित पनाहगाह देश की अदालतें हैं”

बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर ने जब भारत के संविधान की रचना की थी तब उन्होंने कुछ चीजों को केवल और केवल देश की जनता को मद्देनजर रखते हुए ही लिखा था | भारत के संविधान में प्रस्तावना के साथ ही सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक इंसाफ को बाबा साहेब ने भारत की जनता को एक सबसे बड़ी सौगात के तौर पर यह सोच का दिया था कि हो सकता हैं कि देश का एक वर्ग किसी क्षेत्र में आगे बढ़ जाए और बाकी के लोगों के साथ नाइंसाफी प्रारंभ कर दें तो उस समय आम जनता इन हथियारों का प्रयोग कर अपनी सुरक्षा कर सकती थी |

 

लेकिन सबसे बड़ी बात हैं यह हैं कि जैसे-जैसे हम विकास के मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं यह सभी चीजें आम जनता से दूर होती जा रही हैं | और जो बातें बाबा साहेब अम्बेडकर ने आम जनता के लिए वरदान समझ संविधान में लिखी थी आज वहीं सब बातें देश की आम जनता के लिए एक व्यंग के आलावा और कुछ भी नहीं बची |

और सबसे बड़ा मजाक तो देश के संविधान के चौथे अध्याय जिसे “राज्य के नीति निदेशक तत्व” कहते हैं | इस अध्याय में यह बताया गया हैं कि एक शासक को शासन कैसे चलाना चाहिए, देश में प्रशासक राज्य का शासन कार्य कैसे चलाएंगे ? जिसमें देश का संवैधानिक मालिक देश की आम जनता को बनाया गया है, लेकिन आज वहीं देश के संवैधानिक मालिक उसी देश में इंसाफ के लिए गली-गली तरसते भूखे और प्यासे भटकते रहते हैं | “आम जनता में तो आज यह भावना प्रबल हो चुकी हैं कि अगर आपको इंसाफ पाना हैं इस देश में तो सबसे पहले आप कुछ जोड़ी नए जूते खरीद कर रख लीजिये जब तक यह घिसेंगे शायद आपको इंसाफ मिल जाए”

 

और वहीं दूसरी ओर अमीरों के ऐसे मजे आ गए हैं मानों कानून उन्ही के घर की कोई वस्तु हैं जब चाहे और जैसे चाहे उसको उस तरह से अपने फायदे के लिए तोड़ मरोड़कर प्रयोग में ला सकते हैं | अदालत ऐसा लगता हैं कि उनके अपने किसी खास का घर और जज उनका अपना ख़ास ब्यक्ति जिसके साथ वह जैसा चाहे काम करवा सकते हैं |

 

आज पूरी की पूरी न्यायिक प्रक्रिया बड़े-बड़े रसूक दार लोगों, नेताओं और तथा कथित वी.आई.पी. लोगों के हाथों में ही बचा हुआ हैं और यह ऐसा नहीं हैं कि केवल मैं ही कह रहा हूँ, यह बात अक्षरसः सत्य हैं और इस बात को देश की सर्वोच्च न्यायालय ने भी माना हैं |

 

देश की सबसे बड़ी अदालत ने कहा हैं कि “यह कहते हुए हमें बड़ा अफ़सोस होता हैं कि अदालत का वक्त आजकल वरिष्ठ अधिवक्ताओं और बड़े-बड़े अपराधियों के द्वारा प्रयोग किया जा रहा हैं …हम शपथ पूर्वक यह कह सकते हैं कि अदालत का सिर्फ और सिर्फ 5 फीसदी वक्त ही आम जनता के लिए इस्तेमाल किया जाता हैं I और उनकी अपीलों को 20-30 सालों का इंतज़ार करना पड़ता हैं |”

 

आप सभी को ज्ञात होना चाहिए कि अब यह बातें सिर्फ समय तक ही सीमित नहीं रह गयी हैं बल्कि इससे भी आगे निकल चुकी हैं | भारत के संविधान के अनुसार देश के लोकतंत्र को कुछ पैरों पर मजबूती के साथ खड़ा किया गया हैं | जिनमें से कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका हैं | अगर हम न्यायपालिका की तुलना बाकी दोनों से करें तो आम आदमी के हितों में सबसे अधिक काम इसी ने किया हैं | लेकिन इसे हम आम जनता की मजबूरी भी कह सकते हैं क्योंकि उनके पास इसके अलावा और कोई रास्ता इस देश में बचता भी नहीं हैं |

 

लेकिन अब इस पर भी प्रश्नचिन्ह लगाना स्वाभाविक हो गया हैं | और इसकी मजबूरी या फिर इसकी असफलता को अगर कहीं देखना हैं और हमें इसे दलितों, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग में जीवन बिता रहे लोगों, आदिवासियों के मामलों में देख सकते हैं | और अगर हमें इसके अधिकतम उपयोग को देखना हैं तो हमें बड़े–बड़े रसूकदार लोगों, कारपोरेट जगत के दिग्गज घोटाले बाजों, बड़े-बड़े अपराधियों के मामले में इसके फलदायी उपयोग को देख सकते हैं |

 

इन बातों की पुष्टि करने के लिए हाल ही में आये दो अलग-अलग राज्यों के उच्च न्यायालयों के द्वारा दिए गए निर्णयों को हमें बहुत गौर से देखने की आवश्यकता है, जो मामले कुछ इस प्रकार से हैं –

 

पहला मामला है तमिलनाडु की मुख्यमंत्री और पूर्व बॉलीवुड अदाकारा जे.जयललिता का आय से अधिक संपत्ति का प्रकरण और दूसरा मामला है –

 

देश के एक तथाकथित प्रतिष्ठित बॉलीवुड कलाकार सलमान खान का 28 सितम्बर 2002 को मुंबई में शराब के नसे में गाडी चढ़ा देने का चर्चित हिट एंड रन मामला |

 

देश की सर्वोच्च नयायालय के कथनानुसार – जमानत कायदा है, अपवाद नहीं

 

देश की सर्वोच्च न्यायालय ने कभी कहा था कि देश की सभी अदालतों को मामलों की सुनवाई करते समय या फिर किसी भी ब्यक्ति को जमानत देते वक्त एक बात हमेशा ध्यान रखनी चाहिए कि जमानत एक कायदा होता हैं न कि अपवाद होता है |

 

लेकिन आज देश की उसी सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा कहे गए शब्दों का और हमारे पवित्र और प्रतिष्ठित संविधान का बड़े-बड़े लोगों ने और अपराधियों ने मजाक बना कर रख दिया है | इसे प्रयोग में लाने के लिए एक भेदभाव पूर्ण नीति का प्रयोग किया जा रहा है, एक साधारण ब्यक्ति को बिना किसी अपराध या फिर अपराध सिद्ध न होते हुये भी यानिकी विचाराधीन कैदी को भी जमानत लेने में वर्षों का वक्त बीत जाता है और वहीं बड़े-बड़े रसूक दार लोगों को गिरफ्तार होने से पहले ही जमानत की ब्यवस्था कर दी जाती है |

 

आप ऊपर लिखी हुई बातों को बहुत ही साफ़-साफ़ सलमान खान के मामले और अन्य मामलों में भी देख सकते हैं- चलिए आज हम यहाँ आपको सलमान खान के मामले का उदहारण ही देखते हैं –

 

आपने अक्सर देखा होगा इस तरह के बड़े-बड़े लोगों के मामले में केसों को खुलने में ही इतना वक्त लग जाता हैं कि जब तक गवाहों और सबूतों की जरूरत होती हैं तब तक पता चलता है कि आधे से ज्यादा गवाह या तो ऊपर वाले को प्यारे हो गए हैं या फिर उन गवाहों ने अपने बयान बदल दिए या फिर उन्हें इस हालत में पंहुचा दिया जाता है कि वह बयान ही न दे सके |

 

अब इसके बाद आती हैं जांच एजिंसियों की तो इनके बारे में कहने ही क्या है, जांच एजिंसियों की अगर बात करते हैं तो हम यह जान लेते हैं कि जांच तो हमारी पुलिस ही करती है |

 

अब आप बॉलीवुड के दबंग हीरो सलमान खान का मामला ही देख लीजिये कि एक दिन नशे की हालत में अपने दोस्तों के साथ मस्ती करते हुए शराब का खूब रसास्वादन किया और उसके बाद फूटपाथ पर सो रहे बेचारे गरीब मजदूरों के ऊपर से गाडी चढ़ा दी और जब दुर्घटना हो गयी तो जनाब का नशा उतर गया और वह वहां से फरार हो गए | उस समय उनके साथ उनकी रक्षा में लगाया हुआ पुलिस का जवान जो की बॉलीवुड के बॉडीगार्ड  का बॉडीगार्ड था उसने इस बात की शिकायत पुलिस से की तो उसे ही दुनिया भर के सवालों के जवाबों का सामना करना पड गया और अंत में हुआ यह दुनिया की रक्षा करने वाला, नशाखोरी और देहव्यापार को जड़ से उखाड़ फेकने की कसम खाने वाला वह मुंबई पुलिस का होनहार जवान जो किसी भी लालच या फिर दबाव में नहीं टूटा, जिसने कभी अपना बयान नहीं बदला हमेशा चट्टान की तरह अडिग रहा उसे अपनी नौकरी से भी हाथ धोना पड़ा और जिस पुलिस लाकअप में वह कभी अपराधियों को रखता था उसी लाकअप में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा और अंत में एक दिन मुंबई की सड़कों पर उसके बाद मुंबई के भीड़ भरे सरकारी अस्पताल में गुमनामी की जिंदगी जीता हुआ टी.वी. के कारण सरकारी बेड पर मारा गया I

 

और उधर इस पूरे मामले के रचना कार श्री मान सलमान खान महोदय ने बिना किसी डर और फिक्र के 13 साल देश के सबसे बड़े सेलिब्रिटी बने रहे और मजे से जिंदगी जीते रहे और जब 13 साल बाद उन्हें जैसे तैसे निचली अदालत के द्वारा सजा हुई तो उन्होंने देश के सबसे महंगे और बड़े वकीलों को अपने साथ रख तुरंत ही कुछ ही घंटों के भीतर मुंबई की हाईकोर्ट से जमामनत ले ली I

 

सलमान खान के द्वारा किये गए इस घ्रणित कार्य में कितनो की जिंदगी बर्बाद हुई और कितनों के घर बर्बाद हो गए इस बात किसी को कोई अंदाजा नहीं रहा चाहे वह अदालत रही हो या फिर लोग हर किसी ने उसी बर्बादी को केवल और केवल पैसे से तोलने की बात कही | भले ही एक सामान्य ब्यक्ति की ही बता क्यों न हम करें हर किसी को यही लगता हैं कि अब जो कुछ हो गया उसमें क्या करना आखिर जो हो गया वह बदल तो नहीं सकता तो कम से कम पैसे मिल रहे हैं यही शुक्र है उसी से काम चला लो |

 

सभी ने देखा ही होगा कि जिस दिन सलमान खान के मामले की सुनवाई हो रही थी देश का पूरा का पूरा मीडिया और लोग बस इसी का इंतज़ार कर रहा था कि होगा क्या ? पूरा का पूरा बॉलीवुड जगत एक साथ सलमान खान के साथ खड़ा नजर आ रहा था | मीडिया पल पल की रिपोर्ट को कवर करने के लिए उनके घर से अदालत तक ऐसा लगता था कि जैसे हर मीटर पर अपने कैमरे लगा रिपोर्टर खड़े कर रखे हैं | कोई यह कह रहा कि सलमान खान की माँ बेहोश हो गयी तो कोई कह रहा कि उनकी बहन रोने लगी | और देश के इस घ्रणित और नृशंश हत्या के दोषी के खिलाफ रहम की अपील कर रहे थे |

 

अरे अपील करने वालों जरा एक बार उनके बारे में सोचो जिन्होंने एक नशेडी और पैसे की मद में मतवाले पागल हाथी के समान चलने वाले ब्यक्ति की वजह से आज जिन घरों में एक वक्त का चूल्हा जलने में भी दिक्कत होती हैं I जिनके माँ-बाप, बीवी और बच्चे आज दर-दर की ठोंकरे खाने पर मजबूर हो गए हैं I क्या उनका दर्द आप सभी को दिखाई नहीं पड़ता ? क्या उनके लिए आपके ह्रदय में कोई जगह नहीं हैं ? जरा सोचिये अगर यह आपके अपनों के साथ होता और कोई आकर कहता जो हो गया उसे भूल जाइए मैं आपको जितना पैसा चाहिए वह देने के लिए तैयार हूँ ! तो आपको कैसा लगता ? तब भी क्या आपके भाव ऐसे ही रहते ? तब भी क्या आपको उस ब्यक्ति से इतनी ही सहानुभूति होती ?

 

समाज को अपने सोचने और समझने विचारों को प्रस्तुत करने के ढंग को बदलने की आवश्यकता हैं, न्याय केवल और केवल अमीरों के लिए नहीं बल्कि उस समूह के लिए भी बराबर होना चाहिए जिनकी भुजाओं की मेहनत से आपके घरों में चूल्हा जलता हैं |

 

जे जयललिता और अन्य मामले अगले प्रकाशन में – अगर आप इनसे सम्बंधित कोई सलाह दे सकते हैं तो कृपया हमें जरूर लिखे – aapkibaat@akhandbharatnews.com  पर !!!

धन्यवाद !

 

 

नोट- अगर आपको यह लेख सही लगा हो या फिर इसमें कोई कमी रह गयी हो तो आप हमें लिख सकते हैं या फिर आप अगर कोई और लेख या फिर घटना का जिक्र हमारे साथ करना चाहते हैं तो हमें E-mail कर सकते हैं – aapkibaat@akhandbharatnews.com  पर !!!

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