वास्तव में सुखी कौन….? उसके जैसे दो जून की कमाने वाले या हम जैसे बैंक बैलेंस में जीरो बढ़ाने वाले

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कोलकत्ता में आज मेरे साथ कुछ बहुत ही अच्छा हुआ जब मै Cost Tution के अपने रस्ते पर था मैने चांदनी मार्केट जाने के लिए ऑटो लिया, वहां पहुँचने पर जब मैंने पैसे देने के लिए अपनी जेब में हाँथ डाला तब मुझे एहसास हुआ की मै अपना पर्स घर पर ही भूल गया हूँ, मैंने मेरा बैग चेक किया कि शायद इसमें कुछ नगद पड़ा जो कि अक्सर मै डाल दिया करता हूँ, पर उसमें कुछ चिल्लर पड़े थे जो कि मेरी यात्रा के किराए के लिए काफी नहीं थे, इसलिए मैंने ऑटोवाले से कहा की मुझे वापस घर ले चले, उसने बड़े नम्रता से मुझसे पुछा कि आखिर समस्या क्या है और जब मैंने बताया उसने मुझे बिना किराया लिए ही ज्जाने को कहा मैंने मना करते हुए कहा “भैया आपने तो क्र दिया पर मुझे रास्ते में और कौन आप जैसा मिलेगा” वह धीरे से मुस्कुराया और मेरी आगे की यात्रा के लिए मुझे थोड़े नगद पैसे देने लगे, दो-तीन बार बार मना करने के बाद भी जब वो नहीं माने तो मुझे लगा की मुझे ले लेने चाहिए और मने पैसे ले लिए

इस इंसान ने नसिर्फ अपना किराया छोड़ा बल्कि मुझे 20 रुपए भी दिए और यह पूछा की अगर मुझे और अधिक की ज़रूरत है, आजकल के समय में जब मानवता विलुप्त होती जा रही है, मै एक ऐसी शख्सियत से मिला जिसने मेरे चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान ला दी और सोचने को मजबूर क्र दिया की वो हम जैसे लोग है जो अपने बैंक अकाउंट में शून्य बढाने की चिंता में पड़े रहते हैं और कुछ इस जैसे भी जो अपने रोजी रोटी से भी आसानी से किसी को दे देते हैं, तो वास्तव में खुश कौन है….? यह आत्मचिंतन का विषय है |

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Via – Humans of India

 

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