हमें तिलक क्यों लगाना चाहिए, या जब भी कोई हमारे माथे पर तिलक लगा रहा हो उस समय सिर पर हाथ क्यों रखते है

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भारत ही पूरी दुनिया में इकलौता ऐसा राष्ट्र है जहां पर आज भी बहुत से लोगों के माथे पर तिलक शुशोभित होता है | दरअसल आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ऐसा इसीलिए है क्योंकि भारत आज भी अपनी प्राचीन यानी वैदिक कालीन सभ्यता को मानता है और उसके अर्थों को समझने की भी कोशिश करता है | यदि हम तिलक की बात करें तो तिलक भारत वर्ष में प्राचीनकाल से ही लगाने का प्रचलन रहा है | लेकिन ज्यादातर लोगों के इसके पीछे बस केवल एक धार्मिक कारण ही नजर आता है कुछ लोग तो आज इसे एक ढोंग कहकर भी संबोधित करने लगे लेकिन हम आपको बता दें कि इसके पीछे अनेकों वैज्ञानिक कारण भी है |

तिलक लगाने के मनोवैज्ञानिक कारण –
मनोविज्ञान की द्रष्टि से माथे पर तिलक लगाना अत्यंत आवश्यक माना जाता है | इसका प्रमुख कारण यह कहा गया है कि माथा चेहरे का केंद्रीय भाग होता है, जहां सबकी नजर अटकती है। उसके मध्य में तिलक लगा कर, विशेषकर स्त्रियों में, देखने वाले की दृष्टि को बांधे रखने का प्रयत्न किया जाता है |

स्त्रियां लाल कुंकुम का तिलक लगाती हैं। यह भी बिना प्रयोजन नहीं है | लाल रंग ऊर्जा एवं स्फूर्ति का प्रतीक होता है | तिलक स्त्रियों के सौंदर्य में अभिवृद्धि करता है | तिलक लगाना देवी की आराधना से भी जुड़ा है। देवी की पूजा करने के बाद माथे पर तिलक लगाया जाता है | तिलक देवी के आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है |

वैज्ञानिक कारण –
मस्तिष्क के भ्रु-मध्य ललाट में जिस स्थान पर टीका या तिलक लगाया जाता है यह भाग आज्ञाचक्र है | शरीर शास्त्र के अनुसार पीनियल ग्रन्थि का स्थान होने की वजह से, जब पीनियल ग्रन्थि को उद्दीप्त किया जाता हैं, तो मस्तष्क के अन्दर एक तरह के प्रकाश की अनुभूति होती है | इसे प्रयोगों द्वारा प्रमाणित किया जा चुका है हमारे ऋषिगण इस बात को भलीभाँति जानते थे पीनियल ग्रन्थि के उद्दीपन से आज्ञाचक्र का उद्दीपन होगा | इसी वजह से धार्मिक कर्मकाण्ड, पूजा-उपासना व शूभकार्यो में टीका लगाने का प्रचलन से बार-बार उस के उद्दीपन से हमारे शरीर में स्थूल-सूक्ष्म अवयन जागृत हो सकें | इस आसान तरीके से सर्वसाधारण की रुचि धार्मिकता की ओर, आत्मिकता की ओर, तृतीय नेत्र जानकर इसके उन्मीलन की दिशा में किया गयचा प्रयास जिससे आज्ञाचक्र को नियमित उत्तेजना मिलती रहती है |

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