आधी आबादी ,राजनीति से हारी कल भी थी अबला , आज भी अबला

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आज जब हिंदुस्तान की नारी हर क्षेत्र में चाहे वो रणक्षेत्र ही क्यों न हो , कंधे से कंधा पुरुषों के साथ मिलाकर चल रही है , फिर भी राजनीति के क्षेत्र में आज भी हज़ारो वर्षो पूर्व की अपनी दासता के दिनों जैसी स्थिति में ही है । इस स्थिति पर आज भी यह कविता कितनी सटीक बैठती है नारी तेरी यही कहानी आँचल में है दूध आँखों में पानी
देश में कई उदहारण है जब जब महिलाओं को मौका मिला उन्होंने पुरुषों से भी बड़े राजनैतिक कौशल के कार्य कर दिखाया ।

आजादी की लड़ाई से लेकर आजाद हिंदुस्तान के राजनैतिक इतिहास में महिलाओं ने मुख्यमंत्री , राज्यपाल , प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति जैसे महत्वपूर्ण पदों पर आसीन होकर अपने ऐतिहासिक फैसलों के लिये आज भी जानी जाती है । आयरन लेडी के नाम से मशहूर पूर्व प्रधानमंत्री स्व इंदिरा गांधी की विदेश नीति और अंतर्राष्ट्रीय फलक पर देश की कीर्तिं को सबल राष्ट्र के रूप में स्थापित करने और पाकिस्तान को दो भागों में बांटकर बंगला देश बनाने की कूबत इंदिरा गांधी जैसी महिला ही कर सकती है । आज भी पूरे विश्व में भारत की विदेश नीति का डंका बजाने में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का महत्वपूर्ण योगदान है । अभी पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन में किडनी की बीमारी से ग्रसित रहने के वावजूद जिस मजबूती और जीवटता का परिचय देते हुए अपनी कूटनीति से पाकिस्तान को विश्व बिरादरी से अलग थलग कर दिया वह एक महिला की जीवटता और सहनशीलता की एक मिसाल है । ऐसे में अगर महिला सशक्तिकरण और भागीदारी की बात मात्र भाषणों में करना और हकीकत में नजर अंदाज़ करना आधी आबादी के साथ मजाक नहीं तो और क्या है । वर्षो से महिलाओं के लिये राजनीति में प्रवेश सुनिश्चित करने वाला महिला आरक्षण बिल आजतक अधर में लटका है ।

महिला सशक्तिकरण की पुरजोर वकालत करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पार्टी ने यूपी चुनाव में मात्र 5 प्रतिशत महिला प्रत्याशियों को ही टिकट दिया है । इसमें से भी संगठन में महत्वपूर्ण योगदान करने वाली महिला नेत्रियों की परिवारवाद के चलते दरकिनार कर दिया गया है । सबसे रोचक तो प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में महिला का टिकट काटकर उनके बेटे को ही टिकट दिया गया है जबकि इसके लिये कई महिला नेत्रियां लाइन में थी । परिवारवाद का विरोध करने वाली भाजपा भी इस रोग से ग्रसित हो गयी है ।

ऐसा नहीं की भाजपा में ही महिलाओं की उपेक्षा हो रही है बल्कि महिलाओं के नेतृत्व में चलने वाली अन्य दलों में भी यही स्थिति है । कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को भी अपने दल में महिला सशक्तिकरण रास नहीं आ रहा है । दलित समाज की मसीहा कहलाने वाली बसपा सुप्रीमो बहन मायावती को भी अपने दल में महिला नेत्री नहीं दिखती है । समाजवादी पार्टी के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सांसद पत्नी डिंपल यादव जिनके सलाह सपा में महत्वपूर्ण माने जाते है ,को भी अपने दल ने 33 प्रतिशत भी महिलाओं को सीट देना जरूरी नहीं लगा ।
इन दलों में जब भी भीड़ जुटाने की बात होती है महिलाओं को ही आगे किया जाता है ,मतदान कराना होता है महिलाओं को ही सहयोगी बनाया जाता है परंतु जब भी इनको वाजिब हक देने की बात होती है सभी मुंह फेर देते है ।

आखिर आधी आबादी को कब तक शोपीस की तरह राजनीतिक पार्टियों द्वारा इस्तेमाल किया जायेगा ? क्या आज की परिस्थिति में दिल पर हाथ रखकर कहा जा सकता है कि आधी आबादी को पुरुषों के बराबर अधिकार प्राप्त है ? तलाक तलाक तलाक पर कानून बनाने से पहले यह जरुरी है कि महिलाओं को हर क्षेत्र में इतना सशक्त कर दिया जाय कि उनको किसी के सहारे की वैसाखी पर आश्रित न रहना पड़े ।

रिपोर्ट – संतोष कुमार शर्मा

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