दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में महिलाओं की साझेदारी कितनी ?

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एडवोकेट कोमल भारद्वाज (फ़ाइल फोटो)
एडवोकेट कोमल भारद्वाज (फ़ाइल फोटो)

महिलाऐं हमारे देश की आबादी का लगभग आधा हिस्सा हैं इसलिए ग्रामीण विकास में महिलाओं की भागीदारी के बिना हम वास्तविक अर्थ में विकास की कल्पना भी नहीं कर सकते। निश्चित रूप से विकास में महिलाओं की भूमिका पुरूषों से कम नहीं है। संविधान के 73वें संशोधन के माध्यम से पंचायतीराज व्यवस्था को सशक्त करने का प्रयास किया जा रहा है। पंचायतीराज व्यवस्था में महिलाओं के 50 प्रतिशत आरक्षण से महिलाओं की पंचायतीराज व्यवस्था एवं ग्रामीण विकास में सक्रिय सहभागिता में वृद्वि हुई है। महिलाओं के नेतृत्व एवं योगदान से कई ग्राम पंचायतों ने विकास के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित किए है जो कि अपने आप में एक उदाहरण है। संविधान में किया गया 73वां और 74 वां संषोधन ग्रामीण महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण मोड़ था।

क्योंकि इन संषोधनों ने पहली बार स्थानीय स्वशासन में 33 प्रतिषत महिलाओं को चूल्हे से निकाल कर चैपाल में पहुंचाने का काम किया। यह एक क्रांतिकारी कदम था, जिसने भारत के दूरदराज गांवों की महिलाओं को निर्णय प्रक्रिया में भाग लेने का सुअवसर प्रदान किया। ग्रामीण स्तर की महिलाओं के स्थानीय शासन में भागीदारी का एक बड़ा लाभ यह भी हुआ कि इसने देश भर में विधानसभा और संसद में भी महिलाओं के आरक्षण की बहस षुरू कर दी। वर्ष 1995 में इस संषोधन के लागू होने से हर पाँच वर्ष में करीब 25 हजार गांवों में दस लाख महिलाएं स्थानीय सत्ता में काबिज हो रही हैं। लेकिन पंचायतों या स्थानीय निकायों में चुनी जाने वाली महिलाओं के समक्ष अपना सामर्थ्य और क्षमता साबित करने के लिए चुनौतियों की पुलिया लंबी है।

पहले कार्यकाल के लिए चुनी गई महिला प्रतिनिधियों के समक्ष सब से बड़ी चुनौती ष्पुरुशसत्तात्मक सोच थी। जिसके तहत पुरुष सत्ता पर अपना एकाधिकार मानते हैं। राजनीति में महिलाओं की यह भागीदारी वह भी निचले स्तर पर उन्हें गंवारा नहीं थी क्योंकि इससे उन्हें अपनी सत्ता में सुराख होता नजर आया। इसलिए पंचायतों की महिला प्रतिनिधियों को कार्यकाल के आरभिंक वर्षों में ष्रबड़ स्टैम्पष् और उनके पतियों को प्रधानपतियोंकी संज्ञा दी गई। उन्हें पढ़ी लिखी नहीं या पंचायत के कामकाज को समझने में असक्षम बताकर पंचायत का सारा कामकाज पंचायत कर्मी या उनके पति अथवा गांव के किसी प्रभाव शाली व्यक्ति के हाथों केंद्रित रहता। शुरूआती दौर में यह आरोप भी अधिक सुनने में आया कि घूंघट या पर्दे के भीतर रहने वाली महिलाएं विकास के कार्यों को कैसे निपटाएंगी सही भी था,  जिस समाज में वे घरेलु दायित्वों में फेेैसला लेने की हकदार नहीं बन पाई वहां वह पंचायत के विस्तृत दायित्व को निभाने में हिचक महसूस कैसे न करतीं  उन्हें पहली बार विकास कार्यक्रमों को बनाने और लागू करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी उन्हें यह जानकारी देने वाला कोई नहीं था कि अमुक कार्य करने के लिए क्या किया जाए।

 

कुछ राज्यों ने प्रशिक्षण कार्यक्रम बनाए लेकिन उनको लागू करने में कई प्रकार की कमियां थीं। एक या दो कार्यक्रम महिलाओं को पंचायती राज की बुनियादी जानकारी, प्रस्तावित योजनाओं कोे लागू करने के तरीकों और पंचायती राज से जुड़े वित्तीय मामलों की जानकारी देने के लिए पर्याप्त नहीं थे। आखिर कुछ सरकारी और कुछ गैरसरकारी संस्थाओं ने महिलाओं को पंचायती कामकाज का प्रशिक्षण देकर उन्हें उनके अधिकारों के प्रति सचेत किया तो स्थिति बदलने लगी। उत्तर प्रदेष में तो बकायदा प्रस्ताव पारित कर महिला प्रधानों की जगह पर उनके पतियों के बैठक में जाने पर रोक लगाई गई। अपने पहले कार्यकाल के केवल तीन सालों के बाद बहुत सी महिला सदस्यों ने अपनी सक्षमता और अधिकारों को पहचानना शुरू कर दिया। उत्तर और मध्यप्रदेष की बहुत सी पंचायत सदस्यों ने अपने स्थान पर अपने पतियों को बैठकों में भेजने का ही नहीं ब्लकि बैठकों में उनकी मौजूदगी का भी विरोध किया।

लोकतंत्र की इस बुनियादी संरचना से महिलाओं को बाहर करने के लिए बहुत सी घटनाओं में अविश्वास मत का सहारा भी लिया गया। जहां तक सरकार की भूमिका का सवाल है तो सबसे अहम यह है कि पंचायती राज के कामकाज में पारदर्शिता बनाने का काम सरकार को करना होगा। विकास के कार्य में जनता को हर कदम की जानकारी होना जरूरी है। विकास कार्य की योजना बनाने से लेकर उसको लागू करने के प्रत्येक चरण की उन्हें जानकारी होनी चाहिए। सूचना के अभाव में लोग योजना बनाने से लेकर योजना लागू करने तक की स्थिति में कोई फैसला नहीं दे सकते। इसलिए उन्हें सूचना मिले इसके लिए सूचना के अधिकार कानून को लागू कर सरकार अहम भूमिका निभा सकती है।

विकास के कार्यों में पारदर्शिता से भ्रष्टाचार खत्म होगा। इसके अलावा पंचायत में भ्रष्ट सरकारी कर्मचारी जैसे ग्राम सेवक, बीडीओ इत्यादि के खिलाफ सख्त कार्रवाई स्थानीय प्रशासन को स्वच्छ बनाने का काम कर सकती है। लोकतंत्र के पाये मजबूत बने इसके लिए लोगों का सहयोग जरूरी है। मानव विकास की रिपोर्ट के मुताबिक किसी भी राष्ट्र की असली संपति उसके लोग होते हैं और विकास का उद्देष्य ऐसा अनुकूल वातावरण तैयार करना है जिसमें लोग दीर्घ समय तक स्वस्थ और रचनात्मक जीवन जी सकें। लेकिन यह वातावरण लोगों की भागीदारी के बिना संभव नहीं। किसी भी गांव में सड़क बनाने या अन्य किसी विकासात्मक काम की मंजूरी ग्रामसभा के आयोजन के बिना संभव नहीं होती।

प्रायः ग्रामसभाओं के आयोजन के अभाव में बहुत से विकासात्मक कार्य शुरू नहीं हो पाते। इन सभाओं का आयोजन आम लोगों की सक्रियता या सहमति के बिना संभव नहीं। ग्रामवासियों को चाहिए कि अपने क्षेत्र में होने वाले विकास कार्य के प्रति सचेत रहे और इनके अभाव में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएं । भारत की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी कम होने के पीछे अब तक समाज में पितृसत्तात्मक ढांचे का मौजूद होना हैं। यह न सिर्फ महिलाओं को राजनीति में आने से हतोत्साहित करता है बल्कि राजनीति के प्रवेशद्वार की बाधाओं की तरह काम करता है।लेकिन राजनीतिक दलों के भेदभावपूर्ण रवैये के बावजूद मतदाता के रूप में मतदाता के रूप में महिलाओ की भागीदारी नब्बे के दशक के अंत से उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है। ऐसे में यह अनिवार्य हो जाता है कि चुनावों के विभिन्न स्तर पर महिलाओं की भागीदारी का विश्लेषण किया जाय ताकि यह पता लगाया जा सके कि आजादी के साढ़े छह दशक बाद भी इसमें गैरबराबरी क्यों है।

सफलता महिलाओं की चुनाव प्रक्रिया में भागीदारी का विश्लेषण एक पिरामिड मॉडल के रूप में किया जा सकता है। इसमें सबसे ऊपर लोकसभा में उनकी 1952 में मौजूदगी 22 सीट को रखा जा सकता है जो 2014 में 61 तक आ गई है। यह वृद्धि 36 है। लेकिन लैंगिक भेदभाव अब भी भारी मात्रा में मौजूद है और लोकसभा में 10 में से नौ सांसद पुरुष हैं। चुनावों में महिलाओं को टिकट न देने की नीति न सिर्फ राष्ट्रीय पार्टियों की है बल्कि क्षेत्रीय पार्टियां भी इसी राह पर चल रही हैं और इसकी वजह बताई जाती है उनमें जीतने की क्षमता कम होना जो चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण है- भारतीय महिला वोटर- हालांकि भारत के आम चुनावों में महिला उम्मीदवारों की सफलता पिछले तीन चुनावों में बेहतर रही है। यह आंकड़ा राजनीतिक दलों के जिताऊ उम्मीदवार के आधार पर ज्यादा टिकट देने के तर्क को खारिज कर देता है और साथ ही महिला उम्मीदवार न मिलने की बात को निराधार ठहराता है। लोकसभा और फैसले लेने वाली जगहों जैसे कि मंत्रिमंडल में महिलाओं का कम प्रतिनिधित्व सीधे.सीधे राजनीतिक ढांचे से उनको सुनियोजित ढंग से बाहर रखने और मूलभूत लैंगिक भेदभाव को रेखांकित करता है।

हालांकि महिलाएं राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर ठीक ठाक संख्या में राजनीतिक दलों का प्रतिनिधित्व करती हैं लेकिन इन राजनीतिक दलों में भी उच्च पदों पर महिलाओं की उपस्थिति कम ही है। भागीदारी- जो महिलाएं पार्टी के अंदरूनी ढांचे में उपस्थित दर्ज करवाने में कामयाब रही हैं उन्हें भी नेतृत्व के दूसरे दर्जे पर धकेल दिया गया है और वह शीशे की छत को तोड़ पाने में नाकामयाब रही हैं वह राजनीतिक दलों में नीति और रणनीति के स्तर पर बमुश्किल ही कोई महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं और अक्सर उन्हें महिला मुद्दों पर निगाह रखने का काम दे दिया जाता है जिससे कि चुनावों में पार्टी को फायदा मिल सके नब्बे के दशक में भारत में महिलाओं की चुनावों में भागीदारी में उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी देखी गई इस साल हुए आम चुनावों में आज तक की सबसे ज्यादा महिला मतदाताओं की भागीदारी देखी गई। उम्मीद- भारत में महिलाओं ने दलितों या मुसलमानों जैसे श्किसी खास वर्ग के रूप में कभी मतदान नहीं किया और न ही किसी राजनीतिक दल ने राज्य या देश के स्तर पर ऐसी कोशिश की कि उन्हें उनसे जुड़े किसी मुद्दे पर आंदोलित किया जाए। भारतीय महिला वोटर- पार्टियों को महिला मतदाताओं की याद सिर्फ चुनाव के दौरान ही आती है और उनके घोषणापत्रों में किए गए वादे शायद ही कभी पूरे होते हैं।

महिलाओं के मुद्दों के प्रति राजनीतिक दलों की गंभीरता महिला आरक्षण बिल को पास करने में असफलता से ही साफ हो जाती है। पिछले कुछ चुनावों के प्रमुख राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों पर नजर डालने से साफ हो जाता है कि उनमें लैंगिक मुद्दे प्रमुखता रखते हैं। लेकिन घोषणापत्रों में जो वादे किए जाते हैं वह घिसे-पिटे ही होते हैं और चुनावी गहमा.गहमी के बाद आसानी से भुला दिए जाते हैं। भारत में महिला आंदोलन इस वक्त संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के सवालों पर सकारात्मक कार्रवाई को लेकर बंटा हुआ है।

यह मूलतः दो बातों पर केंद्रित है. पहला कुल मिलाकर महिला आरक्षण का कोटा बढ़ाने को लेकर और उसमें पिछली जाति की महिलाओं को लेकर और दूसरा अभिजात्यवाद के मुद्दे पर।विधायी निकायों में महिलाओं के लिए सकारात्मक दिशा में काम किया जाना इस वक्त की जरूरत है। इसके लिए महिलाओं की चुनावी प्रक्रिया में बाधक बनने वाली चीजों को दूर किए जाने की जरूरत है और चुनावी राजनीति में मौजूदा दूरियों को पाटने के साथ ही इसे लैंगिक भागीदारी वाला बनाने की जरूरत है।महिला आरक्षण के अंदर आरक्षण के नाम पर इसे रोकने वाली एसपी और आरजेडी जैसी पार्टियां मोदी की लहर में बह गई हैं। हम उम्मीद करते हैं कि नई सरकार पक्का यह विधेयक पास करेगी और इस दौरान भारत की महिलाएं मोदी के नए जुमले में राहत ढूंढ सकती हैं. -अच्छे दिन आने वाले हैं–

लेखिका – *** एडवोकेट कोमल भारद्वाज ***

 

 

 

 

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